अलगाव का घाव
मेरे ही घर में कब्जा है , ये कैसे बर्दाश्त करूं
ये सभी सियासी एक हो गये कैसे पर्दाफास करूं
पोल खोलकर अपनो की मैं कैसे ये उपहास करूं
मैं स्वाभिमान हूँ भारत का, फिर कैसे अरदास करूं
खाना सारा मेरे घर का, मैं क्या बैठा घास चरूं
मेरे ही घर में कब्जा है , ये कैसे बर्दाश्त करूं
क्यों काशमीर में पाकिस्तानी,डण्डा, झण्डा झूम रहा है
क्यों मेरे देश का नेता दुश्मन के घर-घर में घूम रहा है
क्यों घर की पोलें खोल रहा है ,परदेशों के चौराहों में
क्या भाग्य सुरक्षित है भारत का अंग्रेजो की बाहों में
क्यों भविष्य देखकर भारत का,लावारिस बे-मौत मरूं
मेरे ही घर में कब्जा है ,ये कैसे बर्दाश्त करूं
चूहे बिल को खोद रहे हैं, हम काबिल सब देख रहे हैं
शब्दो के सौदागर सारे ,अपशब्द वाण से फेंक रहे हैं
समाचार में आग लगी हेै ,हम सब बैठे सेंक रहे हैं
अब मुर्दे घर को लूट रहे हैं , हम सब माथा टेक रहे हैं
तुम डरकर चुपचाप खडे हो ,क्या मैं भी चुपचाप डरूं
मेरे ही घर में कब्जा है, ये कैसे बर्दाश्त करूं
मुफ्तखोर मस्ती में मुफ्ती, आतंको को पाल रहा हेै
राजनाथ की गुर्राहट को हंस हंस कर ही टाल रहा है
चैनल में पैनल के तोते, पिंजरो से ही चिल्लाते हेैं
काश्मीर के इस मशान में राम-नाम सत् क्यों गाते हैं
क्या धरती के स्वर्ग में जाकर मैं भी अपना ध्यान धरूं
मेरे ही घर में कब्जा है ,ये कैसे बर्दाश्त करूं
बहुत हो गया ,अब तो निर्णय लेने की कुछ बात करो
करो हवाले सभी फौज के, ऐसी ही कुछ घात करो
नासूर पनपने से पहले इन फोडों, का उपचार करो
अलगाव - वाद की बात करे जो,उन पर ऐसा वार करो
आर्यखण्ड के भारत में,कुछ मैं भी अपनी आग भरूं
मेरे ही घर में कब्जा है, ये कैसे बर्दाश्त करूं।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815

No comments:
Post a Comment