Tuesday, April 7, 2015

                    किसान का सम्मान
मर  गया  किसान  मौसम    के  बिगडती  बाहों में
वर्षात  भी  तो  मौत  को  ही  है  छिडकती गाँवो में
ओले  नही ,गोले   नमक  के  पड  रहे  हैं  घावों में
बस मर  रहा  है अन्नदाता  इस राजनीति  राहों में

अब धन - दाता  तर  रहे  है, अन्नदाता  मर  रहे है
भगवान  भी तो  खेत  से  अब राजनीति कर रहे है
विक्षिप्त   होकर   बादलो  से  वज्र  गिरते  जा रहे है
इस आपदा  से  देश  के   नेता  निखरते  जा रहे है

फाईलों  की  जाँच  में  सर्वे  सिमट  कर  बोलता है
बोट की किमत कफन से,शव लिपट कर तोलता है
पटवारियों   के   हाथ  से  मुर्दो  के  सर्वे  हो  रहे हैं
शमशान से खलियान तक किसान  ही तो रो रहे हैं

मुआवजों की कीमतों से अब कफन सिलते नहीं है
मुआवजे  भी  मौत  से पहले  कभी मिलते नही है
कर्ज  के  इस  मर्ज  से किसान  दब की मर रहा हेेै
हर  सिपाही  सल्तनत   का  राजनीति  कर रहा है

अय्यासियों  में  कई  करोडाें  लुट  रहे बे - भाव से
बू  भी  नही  आती  है हमको  कृषकों  के  घाव से
इस  आपदा  में  दानियों  के   हाथ  बढने  चाहिये
अब हो  दया इस  दीन पर, धनवान अडने चाहिये

खोल  दो  अपनी  तिजोरी, इन  किसानो  के लिये
छोड  दो  ये  सब  छिछोरी, इन   दीवानो  के लिये
अब इस  धरा  के  पूत  पर  सामर्थता दिखलाइये
सान्त्वना के  इन  क्षणो में, गम्भीरता  को लाइये

जाँच  की  इस  आँच से तो मौत भी रूकती नही है
ये  आपदा  भी  तर्क के इस अर्क से झुकती नही हेै
तीव्रता  से  इस  क्षति  का   उपचार  होना  चाहिये
बस, आग  के  इस  यज्ञ  से,निर्दोष बचना चाहिये।।
             राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                    मो09897399815
          rajendrakikalam.blogspot.com


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