Tuesday, April 7, 2015

                        श्रद्वांजलि
मुर्झा गया मेरा सुमन इन मालियों के हाथ से
बे-मौत  ही  मरता रहा आर्दश  के जज्बात से
कालिमा  मेरे कफन से, पोंछ  कर  उजले हुये
हम  मरे थे,जिन चिरागों के  लिये  धुंधले हुये
क्या भरोसा हम करें,बलिदान  की औकात से
मुर्झा गया मेरा सुमन इन मालियों के हाथ से

राजसाही की सियासत  का  सबब सबने सुना
आतंक के अवरोध का हर वाकिया सबने गुना
मैं  अकेला  ही  लडा  था   मौत   के  तूफान से
श्री-देव  का ये प्रश्न  है , आजाद  हिन्दुस्तान से
राजशाही  आज  भी  जिन्दा है अपनी  जात से
मुर्झा गया मेरा सुमन इन मालियों  के हाथ से

राजशाही  सल्तनत का मै बिगुल बनकर चला
अंकुरण औलाद  में  अस्तित्व के जनकर चला
अस्मिता आजाद हो,अवसाद सा तन कर चला
भीड़ की इन छलनीयों में मैं सदा छनकर चला
बे-मौत  मैं  मारा गया, इन  भेदियों के घात से
मुर्झा  गया मेरा सुमन  इन मालियों के हाथ से

लावारिसी  में ,मैं मरा अपने  ही घर की जेल में
मेरी लाश को भी बन्द बोरी में भरा इस खेल में
कौन  थे  उस  खोंप  में, जो   साथ  मेरे  थे खडे़
क्यों बन गये स्वातन्त्रता संग्राम   सैनानी  धडे़
निर्भीक हो कर  मैं लडा था उस  गुलामी रात से
मुर्झा  गया मेरा  सुमन इन  मालियों के हाथ से

बन गया ये राज्य उत्तराखण्ड ,लेकर क्या करोगे
बे-वजह लेकर,सियासी लाश को कब तक मरोगे
राजशाही   ने   पहाडों    को   निचोडा   खा  गये
डाकू, लुटेरे ,सूरमा , क्यों  सल्तनत  में  आ गये
आज  तो पर्वत  भी  रोता  है  सदा  जल-पात से
मुर्झा  गया  मेरा  सुमन इन मालियो  के हाथ से

सल्तनत में वो रियासत आज भी जिन्दा खडी है
दिलजलों में आज  भी, उस  खून की निंदा बडी है
अपमान को भी  ये सियासत सींचती सम्मान से
फिर  से  हीरा  हो  प्रकट  इन  पर्वतों  की खान से
आग  भी  लगती  है  शिखरों  मे   भरी  बर्शात से
मुर्झा गया मेरा सुमन  इन  मालियों   के  हाथ से!!
                राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                    मो09897399815
        rajendrakikalam.blogspot.com

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