आज जिस प्रकार से पढे लिखे राजनीतिक,साधू,सन्यासी,मजहबी लोग आपस में गाली,ग्लौज पर उतर आये हैं,उससे आहत होकर,किन्नरों के माध्यम से व्यंग लिखा है।
शब्द संभाल कर बोलिये,शब्द के हाथ ना पांव
एक शब्द करे औषधी, एक शब्द करे घाव
शब्द में स्तब्ध
गाली हम भी देते हैं मगर बूरी नही लगती
झगडते हम हमेशा हैं मगर दूरी नही लगती
तुम्हारी बद् - जुबानी से, तो नर - संहार होते है
हमारी प्रेम की- वाणी सेे घर घर प्यार होते है
तुम्हारे शब्द की लपटें,वतन अपना जलाती है
तुम्हारे जिस्म की बू से यंहा घृणा ही आती हेै
जवानी और बुढापे भी यहा भीडों में जुटते हेैं
हमारे गीत सुन करके, मुहल्ले नाच उठते हैं
तुम्हारे पास डीग्री और प्रमाणो के जखीरे हैं
जनमत की ही खानो से तरासे खास हीरे हेैं
हमें कूडा समझ, घर से जमाने ने निकाला है
हमारी कौम का मालिक,बस दुनिया में खाला हेै
ना जाति है ,ना मजहब है ,ना कौमी कबीला है
फिर भी एक रहते हैं,ये रब की ही लीला है
तुम्हारे गोत्र ,वर्णो को सदा इतिहास ढोता है
तुम्हारी सभ्यता सुन कर,ये हिन्दुस्तान रोता है
यंहा साधू , सन्यासी के शब्दो में भी ज्वाला है
ब्रह्मचारी की नजरों में खटकती रोज बाला हेै
हर मजहब और धर्मो में,यहा अय्यास दिखते है
हमने तो सुना है बस, जो अखबार लिखते है
सब किन्नर ही बनजाते तो भारत एक हो जाता
सियासत का जमूरा भी भारत माँ को ना खाता
खद्दर के लिबासों में पनपती है, महज गाली
चमन को रोंदने वाले यंहा तैयार हैं माली
हम ना मर्द हैें फिर भी, कुछ तहजीब बाकी है
हमारे दिल में भारत की,अभी भी साफ झाँकी हेै
दुखः होता है सुन करके तुम्हारी बद्-जुबानी को
हमेशा आग लिखता है नेता की कहानी को।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो09897399815
rajendrakikalam.blogspot.com
शब्द संभाल कर बोलिये,शब्द के हाथ ना पांव
एक शब्द करे औषधी, एक शब्द करे घाव
शब्द में स्तब्ध
गाली हम भी देते हैं मगर बूरी नही लगती
झगडते हम हमेशा हैं मगर दूरी नही लगती
तुम्हारी बद् - जुबानी से, तो नर - संहार होते है
हमारी प्रेम की- वाणी सेे घर घर प्यार होते है
तुम्हारे शब्द की लपटें,वतन अपना जलाती है
तुम्हारे जिस्म की बू से यंहा घृणा ही आती हेै
जवानी और बुढापे भी यहा भीडों में जुटते हेैं
हमारे गीत सुन करके, मुहल्ले नाच उठते हैं
तुम्हारे पास डीग्री और प्रमाणो के जखीरे हैं
जनमत की ही खानो से तरासे खास हीरे हेैं
हमें कूडा समझ, घर से जमाने ने निकाला है
हमारी कौम का मालिक,बस दुनिया में खाला हेै
ना जाति है ,ना मजहब है ,ना कौमी कबीला है
फिर भी एक रहते हैं,ये रब की ही लीला है
तुम्हारे गोत्र ,वर्णो को सदा इतिहास ढोता है
तुम्हारी सभ्यता सुन कर,ये हिन्दुस्तान रोता है
यंहा साधू , सन्यासी के शब्दो में भी ज्वाला है
ब्रह्मचारी की नजरों में खटकती रोज बाला हेै
हर मजहब और धर्मो में,यहा अय्यास दिखते है
हमने तो सुना है बस, जो अखबार लिखते है
सब किन्नर ही बनजाते तो भारत एक हो जाता
सियासत का जमूरा भी भारत माँ को ना खाता
खद्दर के लिबासों में पनपती है, महज गाली
चमन को रोंदने वाले यंहा तैयार हैं माली
हम ना मर्द हैें फिर भी, कुछ तहजीब बाकी है
हमारे दिल में भारत की,अभी भी साफ झाँकी हेै
दुखः होता है सुन करके तुम्हारी बद्-जुबानी को
हमेशा आग लिखता है नेता की कहानी को।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो09897399815
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