पाठकों से निवेदन
साथियों इस समय देश का स्वाभिमान किसान किस अवस्था से गुजर रहा है,हम सभी भलिभांति जानते हैं,किसान की सुरक्षा हमारे देश के राजनितिज्ञों के द्वारा की जानी संभव नही है,इसिलिये ये घटनाएं घट रही हैं,
आपसे निवेदन है कि देश के इस स्वाभिमान को सुरक्षित करने के लिये अपने-अपने क्षेत्रो मे अर्थ संचय कर किसानों की रक्षा करें, इस समय यही हमारा धर्म है,आप संस्था बनाये जिसमें मैं इस हेतु मैं एक नगरपालिका में कार्यरत लिपिक 5000रूपये की राशि दे रहा हूं।
किसान की सुरक्षा
तुम भाषणो में लीन थे, वो पेड में गमगीन था
तुम वेदना से हीन थे, वह वेदना से दीन था
तुम मंच के सरपंच सब प्रपंच में मदहोश थे
वो सियासी भावना में बह गया ये दोष थे
दृष्टि में घटना तुम्हारे सामने सब हो रही थी
चेतना सब की सियासी मद की हद में सो रही थी
चाहते तो जान बच सकती थी उस नादान की
पर राजनीति में कंहा है आज कीमत जान की
फिर सियासी तंज की सतरंज चालें चल रही है
वेेदना के इन सुरों से भी सियासत पल रही है
मौत के नाटक के फाटक,सब तरफ से खुल रहे हैें
शव, सियासी ,सल्तनत के शौक में ही झुल रहे हैं
वेदना इस के कफन से लाश दबती जा रही है
ये खबर अब पत्र में भी खास छपती जा रही है
इस मौत में भी जाँच के आदेश होते जायेंगे
अन्नदाता सान्त्वना के शब्द फिर से खायेगे
सत्ता सियासत से अलग कुछ लोग उठने चाहिये
दान के अंकुर धरा में फिर से फुटने चाहिये
सामर्थ्यता से कुछ ना कुछ धन जुटाना चाहिये
अब अन्नदाता की सुरक्षा में तो आना चाहिये
धर्म, मजहब ,जातियों सेे आवाज आनी चाहिये
अब और जाने अन्नदाता की ना जानी चाहिये
बूँद - बूँदो से भरे घट से पिपासा बूझती है
आग को तो बस यही अब एक आशा सूझती है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com
साथियों इस समय देश का स्वाभिमान किसान किस अवस्था से गुजर रहा है,हम सभी भलिभांति जानते हैं,किसान की सुरक्षा हमारे देश के राजनितिज्ञों के द्वारा की जानी संभव नही है,इसिलिये ये घटनाएं घट रही हैं,
आपसे निवेदन है कि देश के इस स्वाभिमान को सुरक्षित करने के लिये अपने-अपने क्षेत्रो मे अर्थ संचय कर किसानों की रक्षा करें, इस समय यही हमारा धर्म है,आप संस्था बनाये जिसमें मैं इस हेतु मैं एक नगरपालिका में कार्यरत लिपिक 5000रूपये की राशि दे रहा हूं।
किसान की सुरक्षा
तुम भाषणो में लीन थे, वो पेड में गमगीन था
तुम वेदना से हीन थे, वह वेदना से दीन था
तुम मंच के सरपंच सब प्रपंच में मदहोश थे
वो सियासी भावना में बह गया ये दोष थे
दृष्टि में घटना तुम्हारे सामने सब हो रही थी
चेतना सब की सियासी मद की हद में सो रही थी
चाहते तो जान बच सकती थी उस नादान की
पर राजनीति में कंहा है आज कीमत जान की
फिर सियासी तंज की सतरंज चालें चल रही है
वेेदना के इन सुरों से भी सियासत पल रही है
मौत के नाटक के फाटक,सब तरफ से खुल रहे हैें
शव, सियासी ,सल्तनत के शौक में ही झुल रहे हैं
वेदना इस के कफन से लाश दबती जा रही है
ये खबर अब पत्र में भी खास छपती जा रही है
इस मौत में भी जाँच के आदेश होते जायेंगे
अन्नदाता सान्त्वना के शब्द फिर से खायेगे
सत्ता सियासत से अलग कुछ लोग उठने चाहिये
दान के अंकुर धरा में फिर से फुटने चाहिये
सामर्थ्यता से कुछ ना कुछ धन जुटाना चाहिये
अब अन्नदाता की सुरक्षा में तो आना चाहिये
धर्म, मजहब ,जातियों सेे आवाज आनी चाहिये
अब और जाने अन्नदाता की ना जानी चाहिये
बूँद - बूँदो से भरे घट से पिपासा बूझती है
आग को तो बस यही अब एक आशा सूझती है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
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