Saturday, December 13, 2014

                     पर्वत की पीडा
आज  हिमालय   वर्षा   से   क्यों  अंगारे   बषार्ता है
प्रदूशण   शिखरों  पर   देखो अपना  तीर्थ बताता है
देवदार  और  चीडों   में  लावा  की  लपट  कराले है
भागीरथ   गंगा   की  लौ  से  आग  लगाने  वाले हैं

सुमन-वृक्ष  की  शाखाओं  पर  चिन्गारी लहराती हैं
सोन्दर्य,शिखर के गीत सदा कविताऐं क्यों गाती हैं
भूकंप भयंकर भोगा है,अब ज्वालामुखी ही बाकी है
शदियों  से  ये देव -भूमि  प्रलय-प्रलाप की झाॅंकी है

ये  गंजा शिखर महातम का आभाष कराने  वाला है
पर्यावरण ,वरण कर  हमने  महाकाल  को  पाला है
अब  सुरंग विस्फोटों से ये शिखर   दहलता जायेगा
इस देवभूमि को उत्तराखण्ड का दावानल ही खायेगा

संभ्रान्त निकम्मे  धृतराष्ट्र, शिखर नोंच कर खातें है
पाखण्डी पर्वत की पीडा,क्यों दुनिया भर में  गाते हैं
हे   पर्वत  के  परंहंस, क्यों  बिकती  है ये  वशुन्धरा
पानी,औेर जवानी को भी आॅंख खोल  कर देख जरा

नाली मुटठी  क्यों बिकती  है  सीढी नुमा  पहाडों में
लुट जाती  है  अव्वल  दोयम  पंचायत  की आडों में
भू - माफिया  भूमि-धर  को   ढूॅंढ  रहे  हैं परदेशों में
अय्यासी  का   होटल   देखो  टिहरी  राज  नरेशों में

स्वयं हाथ से जंगल को जंगल  वाले  ही  काट रहे हैं
सत्ता और  सियासी देखो ,मिलकर बन्दर बाॅंट रहे हैं
असमंजस  होता  है  मुझको  देव  भूमि  के भाॅंडों से
उत्तराखण्ड  बदनाम  हुआ  है ,इन  आवारा  साॅंडों से

जल श्रोंतों पर जनता,प्यासी ,कौन समझने वाला है
आज  यहाॅं पर  चिपको कहने वाला  ही  मतवाला है
पर्यावरण  भ्रमण  से  तो अब ,परदेशों में  ख्याती हैं
स्वर्गारोहण,नरक  द्वार  की सीढी  क्यों बन जाती है

आध्यात्म मोक्ष की वसुन्धरा की त्वरा पुनःपरलक्षित हो
चिन्तन,मन्थन ऐसा हो, हिममण्डित शिखर सुरक्षित हो
नाग,यक्ष, किन्नर, परियों  का पर्वत  शिखर षिवालय हो
आर्यखण्ड का मुकुट  सुशोभित  मस्तक पुनःहिमालय हो

           राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                 9897399815
      rajendrakikalam.blogspot.com

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