Thursday, December 18, 2014

  क्या शास्त्र सार, नर संहार
वाह  रे  सासन  तेरा  भाषण  कितने  बच्चे  पाल रहा है
आज  सनातन  का  रखवाला  डी.एन.ए.  खगाल रहा है
हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख, इसाई  कौम कबीले  काट रहे हो
वशुधैव  कुटुम्बकम्  की परिभांषा चौराहे  में बाँट रहे हो

कौम-कबीलों से  मिल  करके  मेरा  हिन्दुस्तान  बना है
हर रंगो  से  आज तिरंगा,  दुनिया  की  पहचान  बना है
सम्प्रदाय  के कौम कबीलों, क्यों  माँ को नंगा  करते हो
इतिहासों  के  विस्फोटो  से,  हिंसा   कर  पंगा  करते हो

धर्म-ग्रन्थ की सभी  ऋचाएं  चिल्लाकर  के क्यों रोती है
आर्य-खण्ड की धरा आज भी बोझ गधों का क्यों ढोती है
धर्म  सनातन  का  मतलब है, रंग-बिरंगे  फूल खिलाओ
धरती पर मानवता,ममता,समता की  ही शाख हिलाओ

मैं  कूरान  के  पन्नो  से  भी  आग  उगलती  देख रहा हूँ
वेद-शास्त्र  के ग्रन्थो  से  अब  राग  उगलती  देख रहा हूँ
धनपद,  बाईबिल, हिब्रू, में ,  दाग  उबलता  देख रहा हूँ
सम्प्रदाय  के  हर  नालों  में  झाग  उबलता  देख रहा हूँ

गुरूकुल  और  मदरसों  से अब  क्या आतंक पनपाओगे
सत्य,अहिंसा की  धरती  को  हिंसा से  कितना खाओगे
कितना,खून-खराबा होगा,धर्म,मजहब कब तक गायेगा
मानवता  की इस  खेती  को  नरभक्षी कब तक खायेगा

विश्वगुरू  की  परिभांषा  में  अमन-चैन  ही छिपा पडा है
फिर क्यों निष्ठुर  मानवता  में,आतंको का अलग धडा है
मानवता को  खटिक ,कसाई, किस आशा से काट रहे हैं
क्यों सम्प्रदाय के विषमन्थन से जहर धरा में बाँट रहे हैं

हर  मजहब  से  कोई  मानव, मानवता  को  लेकर आये
मानवता  के  नव- अंकुर  को,अब  कोई  दानव ना खाये
धर्मग्रन्थ को फिर से पलटो उस चिन्तनअमल मे लाओ
कविआग कहता है,जग में मानवता की अलख जगाओ।।
             राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                   मो0 9897399815
       rajendrakikalam.blogspot.com










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