Friday, December 26, 2014

                    अश्लीलता 
हम हरिबंस की मधुशाला को बांच रहे थे
पिता  पुत्र  नंगी  नारी  संग  नाच  रहे थे
बागवान  में  संस्कारों  को  झलकाया है
अलविदा ना  कहना ये नंगों को भाया है
 
फिल्मि दुनिया नैतिकता का गाना गाये
नंगी  दुनिया में  नंगों  का  नाच  दिखाये
नंगों   के   नाचों   से    नंगे  खुश  होते हैं
अभिनय के तो राजनीति में भी न्यौते हैं
चलचित्र नाटक शदियों से  चलता आया
कालिदास , भारतेन्दु  दुनिया  को भाया
संस्कारों को काम वाशना  झलकाती थी
इन्द्रपुरी की परियां भी  तो बलखाती थी
नारी  की  हर  इच्छा  में लज्जा होती थी
नगर वधु तो  व्यभिचार से भी रोती थी
चरित्र हीन की  परिभांषा केवल दृष्टि थी
काम शास्त्र  में  शर्म हया कैसी सृष्टि थी
नंगी  नारी  विश्व  सुन्दरी  बन  जाती है
नंगे  पन  के  लोगों  को   नंगी  भाती है
फिल्मी दुनिया सबके कपडे खोल रही है
नंगेपन  को  कलाकार  क्यों बोल रही है
सौ  से  उपर  टी. वी.  चैनल  देख  रहे हैं
सारे चैनल  अपनी - अपनी  फेंक रहे हैं
हम बिस्तर के सारे आशन दिख जाते हैं
ये रंग- बिरंगे  समाचार  हमको भाते हैं
नंगा  बदन  देखने  के  हम भी आदि हैं
मेरे देश  की  सौ  करोड  की  आबादी है
गर्म देश में गरम हवा को,अब ना छाडोे
नई नश्ल  को  काम वाशना में ना मोडो
यौवनता  से  नंगे  पन को दूर भगाओ
नई पीढी संस्कार बने कुछ ऐसा लाओ
नारी अगर आदर्श वस्त्र से ढक जाती है
भारत माॅं को तो  सारी दुनिया भाती है
नंगो  को  मैं  शब्दों  से  नंगा  करता हूं
नई-नई  कविताओं  से  पंगा करता हू
छोटे  और  बडे  का  मुझमें भेद नही है
कवि आग हूं,लिखने में भी खेद नही है!!
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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