अश्लीलता
हम हरिबंस की मधुशाला को बांच रहे थे
पिता पुत्र नंगी नारी संग नाच रहे थे
बागवान में संस्कारों को झलकाया है
अलविदा ना कहना ये नंगों को भाया है
फिल्मि दुनिया नैतिकता का गाना गाये
नंगी दुनिया में नंगों का नाच दिखाये
नंगों के नाचों से नंगे खुश होते हैं
अभिनय के तो राजनीति में भी न्यौते हैं
चलचित्र नाटक शदियों से चलता आया
कालिदास , भारतेन्दु दुनिया को भाया
संस्कारों को काम वाशना झलकाती थी
इन्द्रपुरी की परियां भी तो बलखाती थी
नारी की हर इच्छा में लज्जा होती थी
नगर वधु तो व्यभिचार से भी रोती थी
चरित्र हीन की परिभांषा केवल दृष्टि थी
काम शास्त्र में शर्म हया कैसी सृष्टि थी
नंगी नारी विश्व सुन्दरी बन जाती है
नंगे पन के लोगों को नंगी भाती है
फिल्मी दुनिया सबके कपडे खोल रही है
नंगेपन को कलाकार क्यों बोल रही है
सौ से उपर टी. वी. चैनल देख रहे हैं
सारे चैनल अपनी - अपनी फेंक रहे हैं
हम बिस्तर के सारे आशन दिख जाते हैं
ये रंग- बिरंगे समाचार हमको भाते हैं
नंगा बदन देखने के हम भी आदि हैं
मेरे देश की सौ करोड की आबादी है
गर्म देश में गरम हवा को,अब ना छाडोे
नई नश्ल को काम वाशना में ना मोडो
यौवनता से नंगे पन को दूर भगाओ
नई पीढी संस्कार बने कुछ ऐसा लाओ
नारी अगर आदर्श वस्त्र से ढक जाती है
भारत माॅं को तो सारी दुनिया भाती है
नंगो को मैं शब्दों से नंगा करता हूं
नई-नई कविताओं से पंगा करता हू
छोटे और बडे का मुझमें भेद नही है
कवि आग हूं,लिखने में भी खेद नही है!!
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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