मातृ देवो भवः
आज पुरूष प्रधान देश में, नारी का अपमान देश में
बलात्कार शमशान देश में, ये कैसी पहचान देश में
अन्धे लूले, लंगडे, बहरे, देश की सत्ता चला रहे है
सीता और सावित्री, चौराहों पर जिन्दा जला रहे हैं
नारी की पहचान देश में, व्यभिचार गुणगान देश में
घर-घर गुण्डे पनप रहे हैं, नेता जी अनजान देश में
एक अकेली अबला पर छः गुण्डे बलात्कार करते हैं
भारत माॅं के ये कू-पूत भी कैसा चमत्कार करते हैं
मजबूरी में यति, सती भी विचलित कभी नही होती
मातृ-शक्ति है भारत की जो इज्जत कभी नही खोती
मानवता क्यों काम-वाशना के कारण गिरती जाती है
सत्युग,त्रेता,द्वापर युग की, खेती अय्यासी खाती है
रक्षा - बन्धन के धागों को,व्यभिचार से तोड़ रहे हो
भाग्य विधाता भारत को तुम किस पथ पर मोड़रहे हो
मोबाइल और फिल्मी दुनिया कामदेव के अस्त्र-शस्त्र हैं
तकनीकी के नये दौर से,आधा भारत ग्रस्त त्रस्त है
बन्दर के हाथों में चाकू, बलात्कार ही करवाता है
पाश्चात्य की मदर इण्डिया, हिन्दू की भारत माता है
पूरा-तत्व की शिक्षा,दीक्षा पुनः धरा में लानी होगी
कामवाशना की दुनिया में, फिर से आग लगानी होगी
पढे लिखे संभ्रान्त वाशना के कीडे़ क्यो पनपाते हो
मेरे उद्यानों की कलियों को गलियों में क्यों खाते हो
जन्म-दायिनी बालायें भी अभिशापों में क्यों जीती हैं
जिसको हमने शक्ति माना उसकी ये क्या परिणीति है
मजबूरी है कानूनो में सख्त,वक्त अपनाना होगा
हवश,तमस, दकियानूसी जालिम को भी जाना होगा
दर्दनाक हो पीडा ऐसी, सभी दरिन्दे खोंप मनाये
भारतवाशी इस घटना की पुनरावृत्ति ना दोहराये
संविधान के अनुच्छेदों में परिवर्तन को लाना होगा
नारी को भी संस्कारों का रहन, सहन अपनाना होगा
नंग,अंग,परिधान निमन्त्रण,भोगविलासी बनजाता है
कविताओ से कवि ‘आग ’का छंद हमेशा समझाता है!!
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com
आज पुरूष प्रधान देश में, नारी का अपमान देश में
बलात्कार शमशान देश में, ये कैसी पहचान देश में
अन्धे लूले, लंगडे, बहरे, देश की सत्ता चला रहे है
सीता और सावित्री, चौराहों पर जिन्दा जला रहे हैं
नारी की पहचान देश में, व्यभिचार गुणगान देश में
घर-घर गुण्डे पनप रहे हैं, नेता जी अनजान देश में
एक अकेली अबला पर छः गुण्डे बलात्कार करते हैं
भारत माॅं के ये कू-पूत भी कैसा चमत्कार करते हैं
मजबूरी में यति, सती भी विचलित कभी नही होती
मातृ-शक्ति है भारत की जो इज्जत कभी नही खोती
मानवता क्यों काम-वाशना के कारण गिरती जाती है
सत्युग,त्रेता,द्वापर युग की, खेती अय्यासी खाती है
रक्षा - बन्धन के धागों को,व्यभिचार से तोड़ रहे हो
भाग्य विधाता भारत को तुम किस पथ पर मोड़रहे हो
मोबाइल और फिल्मी दुनिया कामदेव के अस्त्र-शस्त्र हैं
तकनीकी के नये दौर से,आधा भारत ग्रस्त त्रस्त है
बन्दर के हाथों में चाकू, बलात्कार ही करवाता है
पाश्चात्य की मदर इण्डिया, हिन्दू की भारत माता है
पूरा-तत्व की शिक्षा,दीक्षा पुनः धरा में लानी होगी
कामवाशना की दुनिया में, फिर से आग लगानी होगी
पढे लिखे संभ्रान्त वाशना के कीडे़ क्यो पनपाते हो
मेरे उद्यानों की कलियों को गलियों में क्यों खाते हो
जन्म-दायिनी बालायें भी अभिशापों में क्यों जीती हैं
जिसको हमने शक्ति माना उसकी ये क्या परिणीति है
मजबूरी है कानूनो में सख्त,वक्त अपनाना होगा
हवश,तमस, दकियानूसी जालिम को भी जाना होगा
दर्दनाक हो पीडा ऐसी, सभी दरिन्दे खोंप मनाये
भारतवाशी इस घटना की पुनरावृत्ति ना दोहराये
संविधान के अनुच्छेदों में परिवर्तन को लाना होगा
नारी को भी संस्कारों का रहन, सहन अपनाना होगा
नंग,अंग,परिधान निमन्त्रण,भोगविलासी बनजाता है
कविताओ से कवि ‘आग ’का छंद हमेशा समझाता है!!
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com
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