Monday, December 22, 2014

           बेरोजगारी
शिक्षित यौवन हांफ-हांफ कर क्यों मरता है
ना जाने सेवा की कितनी  निविदा भरता है
नये - नये  विज्ञापन  न्युक्ति   के  पड.ता है
परिवारों  की  लाचारी  से  नित   लड.ता है

विज्ञापन तो  धन संचय  की गहन चाल है
इस शिक्षा  से  यौवनता   का  बूरा हाल  है
एक   नौकरी में  आवेदन   हजार   खडे  है
आज  तो  बच्चे  मां, बापों  के गले  पडे  हैं

ज्ञान की  किमत  में  संस्थायें  पैसे  खाती
सरकारें  क्यों  जिम्मेंदारी    नहीं    उठाती
सेवा  की   आशा  में   बच्चे   बाप  पढाता
क्यों  स्नातक गली गली  में  धक्के खाता

भूमाफिया नेता और चोरों की कैसी मस्ती
आज  देश में  शिक्षा की हालत  है  खस्ती
पढ.लिखकर के  देखो यौवन भटक रहा है
भ्रष्टाचारी   केैेसे   भारत   सटक   रहा   है

शिक्षाओं   में   भांषाओं  के  भेद - भाव हैं
आज राष्ट्र में सब से  विकृत  यही  घाव है
शिक्षा सम  हो ,सत्ता  की  औकात नही है
यौवनता  में  राष्ट्र-भक्ति  जज्बात  नही है

राष्ट्र सृजन में  हर शिक्षित को आगे  लाओ
ऐसा सोचो शिक्षित को   भी काम दिलाओ
दायित्व राष्ट्र का शिक्षित को काम दिलाना
स्नातक शिक्षा तक व्यय अनुमान लगाना

क्यों उपनल वाले चौराहों पर आज खडे. हैं
मुर्दों  के  भी   संविधान  में  अलग धडे. है
अपने  खर्चे  नेताओं  के   कितने   भारी है
अब  रोजगार  देने  की  किसकी जि्मेदारी

शिक्षा का उपयोग राष्ट्र की अमुल्य निधि है
यह भी राष्ट्र सृजन करने  की एक  विधि  है
उर्जावान शरीरों  की  हर  युग   में    गाथा
शिक्षित  यौवन  ही  होता  है राष्ट्र  विधाता  ।।
         राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                 मो0 9897399815
    rajendrakikalam.blogspot.com

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