वर्तमान भारत
सोने की चिडि.या था भारत,हम क्यों मिट्टी बेच रहे हैं
भू माफिया , नेता , त्यागी, वषुन्धरा को खेंच रहे हैं
धरती काटी जंगल काटा, मानव को मजहब में बांटा
भ्रष्टाचारी राजनीति में मजा ले रहे बिडला टाटा
निम्न कोटि की मानवता में मुझे बतादो कंहा ज्ञान है
विश्व व्योम को पकड.रहा है जमी पे भारत ही महान है
सोने की चिडि.या था भारत,हम क्यों मिट्टी बेच रहे हैं
भू माफिया , नेता , त्यागी, वषुन्धरा को खेंच रहे हैं
धरती काटी जंगल काटा, मानव को मजहब में बांटा
भ्रष्टाचारी राजनीति में मजा ले रहे बिडला टाटा
निम्न कोटि की मानवता में मुझे बतादो कंहा ज्ञान है
विश्व व्योम को पकड.रहा है जमी पे भारत ही महान है
नदियां सूखी नाले सूखे घर - घर के पतनाले सूखे
अब तो पवन,वमन करती है,मन, मानव, मतवाले सूखे
सूख रहा है धरती अम्बर, जोगी, भोगी और पैगम्बर
कलियों का मुरझाता नम्बर, कैसा परंपिता, आडम्बर
देख रहा हूॅं जर-जर दुनिया मुझे बतादो कंहा जान है
विश्व व्योम को पकड.रहा है जमी पे भारत ही महान है
अब तो पवन,वमन करती है,मन, मानव, मतवाले सूखे
सूख रहा है धरती अम्बर, जोगी, भोगी और पैगम्बर
कलियों का मुरझाता नम्बर, कैसा परंपिता, आडम्बर
देख रहा हूॅं जर-जर दुनिया मुझे बतादो कंहा जान है
विश्व व्योम को पकड.रहा है जमी पे भारत ही महान है
विश्व सुन्दरी नंगी नारी, यति,सति घर - घर में भारी
बलात्कार की मारा मारी, व्यभिचार से लज्जा हारी
व्यर्थ वासना जाग रही है, यौवनता क्यों भाग रही है
महज प्यार धोखा है तन का,प्रेम वासना जाग रही है
ब्रहमचर्य से बानप्रस्त तक, मानवता की लुटि शान है
विश्व व्योम को पकड.रहा है जमी पे भारत ही महान है
ब्रहमचर्य से बानप्रस्त तक, मानवता की लुटि शान है
विश्व व्योम को पकड.रहा है जमी पे भारत ही महान है
सेवक बाबू और अधिकारी, पड. गये प्रजातंत्र में भारी
धनबल संकट मोचन हारी,चरित्रहीन की महिमा न्यारी
तंत्र यंही से लटक रहा है, सत्ता सेवक सटक रहा है
प्रजातंत्र को पटक रहा है, भय से भारत भटक रहा है
अखवारों में नित पढ.ता हूं,मुझे बतादो कंहा मान हैं
विश्व व्योम को पकड.रहा है जमी पे भारत ही महान है
धनबल संकट मोचन हारी,चरित्रहीन की महिमा न्यारी
तंत्र यंही से लटक रहा है, सत्ता सेवक सटक रहा है
प्रजातंत्र को पटक रहा है, भय से भारत भटक रहा है
अखवारों में नित पढ.ता हूं,मुझे बतादो कंहा मान हैं
विश्व व्योम को पकड.रहा है जमी पे भारत ही महान है
न्याय व्यवस्था टूट रही है,तुला न्याय से छूट रही है
इज्जत खुलकर लूट रही है, मानवता को कूट रही है
अधिवक्ता भी चिल्लाते हैं,अब तो सब मिलकर खाते हैं
काया, माया, औखाते हैं, मुजरिम क्यों गीता गाते हैं
न्यायालय में देख रहे हो न्यायाधीश का कंहा ध्यान है
विश्व व्योम को पकड.रहा है,जमी पे भारत ही महान है
इज्जत खुलकर लूट रही है, मानवता को कूट रही है
अधिवक्ता भी चिल्लाते हैं,अब तो सब मिलकर खाते हैं
काया, माया, औखाते हैं, मुजरिम क्यों गीता गाते हैं
न्यायालय में देख रहे हो न्यायाधीश का कंहा ध्यान है
विश्व व्योम को पकड.रहा है,जमी पे भारत ही महान है
धनवानों का धन काला है,धन से क्यों लुटती बाला है
धनिक, देष में मतवाला है,भाग्य विधाता धन वाला है
ईष्वर को धन पाल रहा है, अपने ढंग में ढाल रहा है
सच्चाई को टाल रहा है, नरक में सबको डाल रहा है
चोर, उचक्के, भ्रश्टा चारी,सब दुनिया में चरितवान हैं
विश्व व्योम को पकड.रहा है जमी पे भारत ही महान है
धनिक, देष में मतवाला है,भाग्य विधाता धन वाला है
ईष्वर को धन पाल रहा है, अपने ढंग में ढाल रहा है
सच्चाई को टाल रहा है, नरक में सबको डाल रहा है
चोर, उचक्के, भ्रश्टा चारी,सब दुनिया में चरितवान हैं
विश्व व्योम को पकड.रहा है जमी पे भारत ही महान है
हिन्दू,मुस्लिम, सिक्ख, इसाई परिवर्तन में लगे पडे हैं
धर्म,कर्म और सम्प्रदाय में,स्वर्ग,मोक्ष के अलग धडे हैं
सब डेढ अरब की आबादी में, नंगे - भूखे ढूंढ रहे हैं
इन भेडों को सभी अखाडे , अपने ढंग से मूंड रहे हैं
कवि आग को सब कहते हैं,भैय़्या ये तो धरम् दान है
विश्व व्योम को पकड.रहा है जमी पे भारत ही महान है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com
धर्म,कर्म और सम्प्रदाय में,स्वर्ग,मोक्ष के अलग धडे हैं
सब डेढ अरब की आबादी में, नंगे - भूखे ढूंढ रहे हैं
इन भेडों को सभी अखाडे , अपने ढंग से मूंड रहे हैं
कवि आग को सब कहते हैं,भैय़्या ये तो धरम् दान है
विश्व व्योम को पकड.रहा है जमी पे भारत ही महान है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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