जिन्दगी में आदमी ना जाने क्या-क्या कर बैठा
कहीं मन्दिर बना बैठा ,कहीं मस्जिद बना बैठा
परिन्दा हमसे अच्छा है,जो आपस में नहीं लडता
कभी मन्दिर में जा बैठा कभी मस्जिद में जा बैठा।।
वक्त का रक्त
जब आदमी ही नही रहेगा इस जमीं में
किस तरह फूटेंगे नव-अंकुर नमी में
कुछ ठूँठ है जो सूख गये हैं इस गमी में
कुछ कमी अब्बा में है, कुछ है अमी में
संस्कार की तालीम अब तो बचपना है
क्यों मदरसों में लगा कोहरा घना है
हर जगह शिक्षा नुमाइस हो रही है
नई पीढियाँ तालीम से क्यों खो रही हेै
अब किताबें आदमी लिखता नही है
क्या लिखे,जबआदमी दिखता नही है
अब दूर तक हैवानियत का शोर हेै
दिल का नही, अब ये दिमागी दौर है
फिर भी पूजा, हज, नमाजी हो रही है
इस धर्म से इन्सानियत ही खो रही है
मन्दिरो,मस्जिद के झगडे ही खडे है
हर धर्म के अपनी जमातो के धडे है
हर मजहब नस्लों में कीडे पालता है
गन्दगी हर शख्स उसमें डालता है
हैवानियत पूरा जहर निचोडती हेै
फिर सियासत भी कहर को मोडती है
क्याआदमी फिर से जमी पर आयेगा
कोई फरिस्ता गीत रब के गायेगा
वो भरोसा, आज ,बस, माँ भारती है
उस आग को चिन्गारिया पुकारती है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com
कहीं मन्दिर बना बैठा ,कहीं मस्जिद बना बैठा
परिन्दा हमसे अच्छा है,जो आपस में नहीं लडता
कभी मन्दिर में जा बैठा कभी मस्जिद में जा बैठा।।
वक्त का रक्त
जब आदमी ही नही रहेगा इस जमीं में
किस तरह फूटेंगे नव-अंकुर नमी में
कुछ ठूँठ है जो सूख गये हैं इस गमी में
कुछ कमी अब्बा में है, कुछ है अमी में
संस्कार की तालीम अब तो बचपना है
क्यों मदरसों में लगा कोहरा घना है
हर जगह शिक्षा नुमाइस हो रही है
नई पीढियाँ तालीम से क्यों खो रही हेै
अब किताबें आदमी लिखता नही है
क्या लिखे,जबआदमी दिखता नही है
अब दूर तक हैवानियत का शोर हेै
दिल का नही, अब ये दिमागी दौर है
फिर भी पूजा, हज, नमाजी हो रही है
इस धर्म से इन्सानियत ही खो रही है
मन्दिरो,मस्जिद के झगडे ही खडे है
हर धर्म के अपनी जमातो के धडे है
हर मजहब नस्लों में कीडे पालता है
गन्दगी हर शख्स उसमें डालता है
हैवानियत पूरा जहर निचोडती हेै
फिर सियासत भी कहर को मोडती है
क्याआदमी फिर से जमी पर आयेगा
कोई फरिस्ता गीत रब के गायेगा
वो भरोसा, आज ,बस, माँ भारती है
उस आग को चिन्गारिया पुकारती है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
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