Friday, December 19, 2014

                  धर्म का मर्म
इस जंहा में हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख,इसाई पल रहे है
हर  मजहब  मे आदमी  ही  आदमी को  खल रहे है
दुर्भाग्य  है ,आतंक  भी  अब  धर्म से  ही चल रहे है
मजहबी धन्धो  में  बन्दे, किस  तरह  से ढल रहे है

क्या आदमी का धर्म से विस्वास  उठता  जा रहा है
इस  चमन  में हर कलि का श्वांस  घुटता जा रहा है
अब  आने  वाली  पीढीयाँ  विस्फोट  लेकर आयेंगी
अस्त्र  की जरूरत  नही है, ये कौम  दुनिया खायेगी

ये  तासीर  है  तालीम  की ,हम बीज ऐसे बो रहे हैं
ना  समझ  धर्मात्मा   ही  धर्म  को  अब  ढो रहे हैं
हर मजहबआतंक को,घर-घर में चुनकर बो रहा है
इस आदमी की भीड में बस,आदमी ही  खो रहा है

अब मन्दिर  बनेगे,आतंक के पर्याय के  चौराहे में
ये  खेल  होगा  अब सियासी सल्तनत के साये में
अब  आने  वाली  पीढीया, आर्दश  उनका गायेंगी
विस्फोट की ये कौम दुनियाँ में मजहब से आयेगी

हर  खबर  से  खून  के  कतरे  ही  गिरते जा रहे हैं
काफिर मुसाफिर,मजहबों से रोज घिरते जा रहे हैं
सिर फिरे  मरते  हैं, फिर भी रोज फिरते जा रहे हैं
हम  अहिंसक  भी  नपुंसक  से  सिंहरते जर रहे है

क्या  कोई  ऐसा धर्म,मजहब इस धरा में आयेगा
जो आदमी, बस, आदमी, बस आदमी ही गायेगा
मैं इन्तजारी  में  उसी  के, छन्द लिखता जाउँगा
मैं आग हूँ,इस आग  से  उस आग को भी गाउगा।।
           राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                 मो0 9897399815
       rajendrakikalam.blogspot.com

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