साथियों मैं अक्टूबर को राष्ट्र के गौरव श्री सरदार पटेल के जन्म दिवश पर लखनऊ एक कवि सम्मेलन में गया था,वापस लौटते समय रेल में वेटिंग का टिकट मिला,टी.टी. महोदय पैसा लेकर सीटें बांट रहे थे,मैने भी सीट के लिये निवेदन किया तो वे चिड गये और कहने लगे कि ज्यादा बोलोगे तो डिब्बे से बाहर फिंकवा दूंगा। मैं शान्त ऱहा और सारी रात खडे-खडे हरिव्दार पहुंचा,पूरी रात डिब्बे में बैठे यात्रीयों पर गौर करता रहा,सुबह तीन बजे उपरोक्त रचना रची गयी,जाते समय मैंने टी.टी महोदय को धन्यवाद दिया।
साथियों आपसे निवेदन है कि इस रचना को भारतीय रेल मंत्रालय तक पंहुचाने की कृपा करें,शायद ये शब्द राष्ट्र के काम आ सकें और प्रत्येक स्टेशन पर यह रचना राष्टहित में छपी मिले।
रेल
ये हिन्दुस्तान की रेलें जंहा का बोझ ढोती हैं
गरीबों और अमीरों की ये पुस्तैनी बपौती है
कोई कीमत चुकाता है ,कोई है मुफ्त का आदि
यहां ए.सी. में बापू की चमकती देख लो खादी
हिन्दू और मुस्लिम भी सफर में साथ चलते हैं
यहाॅ पर सिक्ख,इसाई के,मिलकर मन मचलते हैं
यहाॅं तो धर्म और मजहब का दरिया साथ बहता है
यहाॅं निर्पेक्ष कौमों का हमेशा साथ रहता है
यहां फिरका परस्ती भी अदब से पेश आते हैं
यहाॅ तहजीब हिन्दुस्तान की जंक्सन बताते हैं
हरी और लाल झण्डी के करारों के इशारे हैं
यहाॅं पर मौन अनुशाशन , ये कैसे नजारें हैं
हरकत भी नही होती है जब पटरी बदलती है
यहां मजहब मचलते हैं तो पूरी कौम जलती है
हूकूमत भी तो रेलों के रवेलों से ही पलती है
यंहा फिरकापरस्ती भी सियासत से निकलती है
जीवन के सफर में भी मिलकर रेल बन जाओ
इसकी मौन भांषा का अमल जीवन में दिखलाओ
हर मजहब के डिब्बे को ,ईजंन एक ढोता है
सिमट कर आज भी डबरो में,हिन्दुस्तान रोता है
रेलों के ही खेलों से ये हिन्दुस्तान पलता है
सियासत की हूकूमत से क्यों अरमान जलता है
सभी डिब्बों में बैठे हैं अमन और चैन लाने को
यंहा जंजीर खिंचती है वतन अपना जलाने को
हर मजहब सिखाता है अमन और प्रेम को लाना
यहां इंजन का हर डिब्बा है पटरी का ही दीवाना
काफिर हो , मुसाफिर हो सफर अंजाम देता है
ना झण्डा है ,ना सीटी है यहाॅं फरमान नेता है
सारे राज्य जुडते हैं, इस पटरी के धागे से
ये रेलें ही तो बुनती हैं, हिन्दुस्तान आगे से
बस, भारत ही दिखता है, मजहब की निगाहों से
सिमटता है वतन मेरा, रेलों की ही बाहों से
सफर का एक ही चिन्तन,ये जीवन खेल हो जाये
हिन्दुस्तान का जज्बा जगत की रेल हो जाये
बने पटरी मजहब और धर्म,का बस मेल हो जाये
चालक आग जैसा हो, दरिन्दा फेल हो जाये।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com
साथियों आपसे निवेदन है कि इस रचना को भारतीय रेल मंत्रालय तक पंहुचाने की कृपा करें,शायद ये शब्द राष्ट्र के काम आ सकें और प्रत्येक स्टेशन पर यह रचना राष्टहित में छपी मिले।
रेल
ये हिन्दुस्तान की रेलें जंहा का बोझ ढोती हैं
गरीबों और अमीरों की ये पुस्तैनी बपौती है
कोई कीमत चुकाता है ,कोई है मुफ्त का आदि
यहां ए.सी. में बापू की चमकती देख लो खादी
हिन्दू और मुस्लिम भी सफर में साथ चलते हैं
यहाॅ पर सिक्ख,इसाई के,मिलकर मन मचलते हैं
यहाॅं तो धर्म और मजहब का दरिया साथ बहता है
यहाॅं निर्पेक्ष कौमों का हमेशा साथ रहता है
यहां फिरका परस्ती भी अदब से पेश आते हैं
यहाॅ तहजीब हिन्दुस्तान की जंक्सन बताते हैं
हरी और लाल झण्डी के करारों के इशारे हैं
यहाॅं पर मौन अनुशाशन , ये कैसे नजारें हैं
हरकत भी नही होती है जब पटरी बदलती है
यहां मजहब मचलते हैं तो पूरी कौम जलती है
हूकूमत भी तो रेलों के रवेलों से ही पलती है
यंहा फिरकापरस्ती भी सियासत से निकलती है
जीवन के सफर में भी मिलकर रेल बन जाओ
इसकी मौन भांषा का अमल जीवन में दिखलाओ
हर मजहब के डिब्बे को ,ईजंन एक ढोता है
सिमट कर आज भी डबरो में,हिन्दुस्तान रोता है
रेलों के ही खेलों से ये हिन्दुस्तान पलता है
सियासत की हूकूमत से क्यों अरमान जलता है
सभी डिब्बों में बैठे हैं अमन और चैन लाने को
यंहा जंजीर खिंचती है वतन अपना जलाने को
हर मजहब सिखाता है अमन और प्रेम को लाना
यहां इंजन का हर डिब्बा है पटरी का ही दीवाना
काफिर हो , मुसाफिर हो सफर अंजाम देता है
ना झण्डा है ,ना सीटी है यहाॅं फरमान नेता है
सारे राज्य जुडते हैं, इस पटरी के धागे से
ये रेलें ही तो बुनती हैं, हिन्दुस्तान आगे से
बस, भारत ही दिखता है, मजहब की निगाहों से
सिमटता है वतन मेरा, रेलों की ही बाहों से
सफर का एक ही चिन्तन,ये जीवन खेल हो जाये
हिन्दुस्तान का जज्बा जगत की रेल हो जाये
बने पटरी मजहब और धर्म,का बस मेल हो जाये
चालक आग जैसा हो, दरिन्दा फेल हो जाये।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
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