Monday, December 15, 2014

क्या धर्म बिक रहा है
आज हमारा धर्म विदेशी धरती का एक हाट हो गया
जैसे लावारिस गंगा में, मन मर्जी का घाट हो गया
सभी विरक्ती इस धन्धे में तन मन धन से लगे हुये है
हम जैसे कुछ थोडे मुर्दे, इस भारत में जगे हुये है

गोपनीय आध्यात्म जगत को हम कौडी में बेच रहे हैं
माया मिथ्या कहने वाले, केवल माया खैंच रहे हैें
अतरंग चेतना की ये विद्या, धन से तन में डाल रहे हैं
दो कौडी के माया धारी धर्म सनातन पाल रहे हैं

गायित्री मंत्रो की कैसी चोैेराहों पर हाट लगी है
आज धरोहर धर्म-कर्म की क्यों मुर्खो की बाट लगी है
कू-पात्र भी वेद,शास्त्र और धर्म-ग्रन्थ को खोल रहे हैं
ऋषि ,मुनि की वाणी देखो सारे तोते बोल रहे हैं

आश्रम, मठ,मन्दिर में केवल,परी विदेशी नाच रही है
बृन्दावन की रास, नाश कर, गोरी चमडी बाँच रही हेै
सुर-तालो की इस माया में,बाबा जी संस्कार भूल गये
काम-वाशना की शूली में, सभी लंगोटे दार झूल गये

जो विदेश में गया यंहा से, वो ही इज्जत दार हो गया
दो पैसे क्या पडे हाथ में, कुल-द्रोही अवतार हो गया
आज विदेशी धरती जाने वालों की क्यों होड लगी हेै
देख रहा हूँ, जटिल व्याधि है,संस्कारो में कोढ लगी हेै

क्यों आज सनातन ठेकेदारों के हाथों से लुटा पडा हेै
भारत की ये मूल धरोहर योग, भोग से घुटा पडा है
तन्त्र-मंत्र की सारी विद्या, अखवारो में छप जाती हेै
पातंजलि कीयोगी पीढी,भीख मांग कर क्यों खाती है

आओ मिल कर धर्म बेचने वालों का बहिष्कार करो
ये इज्जत के योग्य नही है,मिल कर सब तृष्कार करो
आध्यात्म की गुप्त धरोहर का फिर से सम्मान करो
माया में जो गुरू फँसे है, उनका ना गुणगान करो

धर्मो का परिवर्तन छोडो, बस, अपना धर्म बचाना है
हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, इसाई परिवर्तन बचकाना है
हमआर्यखण्ड के वाशी हैं,जंहा गमन मोक्ष का होता है
अस्तित्व धर्म का पाखणडी गुरूओं के कारण खोता है

धर्म जगत का छत विक्षत, विध्वंश दिखायी देता हेै
नासूर धर्म में छिपा हुआ, वो अंश दिखायी देता हेै
मैं सचेत करता हूँ केवल छन्दो की परिभांषा से
कवि आग हूँ, बोल रहा हूूूूँ, बुझा हुआ कुछ आशा से ।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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