पाक की राख
इन्दिरा ने भी ऐसा धोखा भिण्डर वाले से खाया है
वही अस्त्र अब पाकिस्तानी सरकारों ने अपनाया है
भस्मासुर को पाला है तो मिटने को तैयार रहो
अगर आदमी बनना है तो प्यार कहो,बस,प्यार कहो
लालन पालन,सर्प ,सपोलों का तुमने ही सिखलाया है
भारत में आंतकवाद भी तेरे ही घर से आया है
दुसरों की खाई खोदोगे, खुद भी उसमे गिरना होगा
नई पीढी को राजनीति के षडयन्त्रो से मरना होगा
हमतो तुमको मना रहे हैं,मिलजुलकर भी रहना सीखो
अगर पडोसी अच्छे हो तो,कुछ तो अच्छे बनकर दीखो
कोमल कलियाँ मशल रहे हो राजनीति के जज्बातो से
क्यों औलादें कटवाते हो अपनी ही कर्कस जातों से
अभी समय है हाथ बढाओ, उग्रवाद निपटाना है तो
देर नही है, सोचो समझो, प्रेम - पन्थ में आना है तो
कमजारी में अकड के रहना अपने ही घर को खाता है
दुनिया में ना समझी वाला,नजरों से भी गिर जाता हेै
तालीबानी अल्लाह-अल्लाह कह कर ही तो मार रहे हैं
क्या कूरान में छिपे हुये थे, ये भी कुछ हथियार रहे हैं
दुख होता है एक धर्म है,फिर भी बच्चों को खाता है
किस मूंह सेआतंकवाद भी,आयत अल्लाह की गाता है
बच्चे चाहे किसी मजहब के हों,खुद ही अल्लाह होते है
खुद अल्लाह को मारने वाले खच्चर बोझा क्यों ढोते है
पाकिस्तानी आवामो को मैं छन्दों से समझाता हूं
जब-जब तुझको दुख होता है,मै भी दुख से कहराता हूं
ये जेहादी हरकत छोडो, सीमा को सीने से जोडो
पूरातत्व के इन काँटो से कोमल कलियों को मत तोडो
तुम तो मेरे ही हिस्से हो,फिर भी क्स्सिे काट रहे हो
कवि आग की चिन्गारी को क्यों शोलों में बाट रहे हो।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com
इन्दिरा ने भी ऐसा धोखा भिण्डर वाले से खाया है
वही अस्त्र अब पाकिस्तानी सरकारों ने अपनाया है
भस्मासुर को पाला है तो मिटने को तैयार रहो
अगर आदमी बनना है तो प्यार कहो,बस,प्यार कहो
लालन पालन,सर्प ,सपोलों का तुमने ही सिखलाया है
भारत में आंतकवाद भी तेरे ही घर से आया है
दुसरों की खाई खोदोगे, खुद भी उसमे गिरना होगा
नई पीढी को राजनीति के षडयन्त्रो से मरना होगा
हमतो तुमको मना रहे हैं,मिलजुलकर भी रहना सीखो
अगर पडोसी अच्छे हो तो,कुछ तो अच्छे बनकर दीखो
कोमल कलियाँ मशल रहे हो राजनीति के जज्बातो से
क्यों औलादें कटवाते हो अपनी ही कर्कस जातों से
अभी समय है हाथ बढाओ, उग्रवाद निपटाना है तो
देर नही है, सोचो समझो, प्रेम - पन्थ में आना है तो
कमजारी में अकड के रहना अपने ही घर को खाता है
दुनिया में ना समझी वाला,नजरों से भी गिर जाता हेै
तालीबानी अल्लाह-अल्लाह कह कर ही तो मार रहे हैं
क्या कूरान में छिपे हुये थे, ये भी कुछ हथियार रहे हैं
दुख होता है एक धर्म है,फिर भी बच्चों को खाता है
किस मूंह सेआतंकवाद भी,आयत अल्लाह की गाता है
बच्चे चाहे किसी मजहब के हों,खुद ही अल्लाह होते है
खुद अल्लाह को मारने वाले खच्चर बोझा क्यों ढोते है
पाकिस्तानी आवामो को मैं छन्दों से समझाता हूं
जब-जब तुझको दुख होता है,मै भी दुख से कहराता हूं
ये जेहादी हरकत छोडो, सीमा को सीने से जोडो
पूरातत्व के इन काँटो से कोमल कलियों को मत तोडो
तुम तो मेरे ही हिस्से हो,फिर भी क्स्सिे काट रहे हो
कवि आग की चिन्गारी को क्यों शोलों में बाट रहे हो।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
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