Thursday, June 9, 2016

मजबूरी में गरीबी
मैं गरीब हूँ, राजनीति से मेरा सारोकार नही हेै
भ्रष्टाचार मिटाने वाली आज कोई सरकार नही हेै
कोउ नृप होइ हमें का हानि, धर्मो का दरबार नही है
राष्ट्रभक्ति के इन तोतो में, राष्ट्र प्रेम संस्कार नही है
राजनीति में चिन्गारी है,पर जलता अंगार नही है
मैं गरीब हूँ, राजनीति से मेरा सारोकार नही हेै

खाद्यान्न की कीमत सुनकर हम गरीब मरही जाते हैं
अय्यासी में जीने वाले ये नेता क्या - क्या खाते हैं
ए.सी. कमरो से हम भूखे-नंगो के निर्णय होते हेै
संसद में तो पक्ष - विपक्षी दोनो के परिणय होते है
प्रजातन्त्र मे दीन-दयालू हम नंगो का यार नही है
मैं गरीब हूँ, राजनीति से मेरा सारोकार नही हेै

सबकी अपनी अपनी ढपली, अपने अपने रंग राग हैं
जनमत के इस उत्सव में,पांच साल तक नंग फाग हेैं
नरभक्षी कंही सिंह,बाघ हैं,कंही विषैले फनी नाग हैं
जंगल में भी चील,गिद्व ये,बकुल भेष में छिपे काग हैं
मानव-मानव में हिंसा है,जानवरों सा प्यार नही है
मैं गरीब हूँ, राजनीति से मेरा सारोकार नही हेै

मंहगायी और बे-रोजगारी की चैनल में बात नही है
जनसंख्या पर रोक लगाना नेता की औकात नही हेै
डेढ अरब की भीड बहुत है, मानवता की जात नही है
कौम,कबीले,मजहब सारे लावारिस हैं ,तात नही है
राजनीति में महामारी का कंही कोई उपचार नही है
मैं गरीब हूँ, राजनीति से मेरा सारोकार नही हेै

मानव मर कर जानवरों सा घास की रोटी खाता हो
जिस धरती में मरघट हो शमशान सुलगता जाता हो
बस,भारत माता की जय बोलो नेता ये समझाता को
नेताओ का बोट - बैक से केवल जनमत नाता हो
भूखा नक्सलवादी होना ये कोइ अत्याचार नही है
मैं गरीब हूँ, राजनीति से मेरा सारोकार नही हेै

हम गरीब तो राजनीति की कुर्बानी ही झेल रहे हैं
मजबूरी है,हिन्दू,मुस्लिम, सिक्ख, इसाई खेल रहे हेैं
जनमत भेडों का जमघट है ,जिसको नेता मूँड रहे हैं
प्रजातन्त्र के सभी कसाई,जाति मजहब को ढूँढ रहे है
कवि आग इन नेताओं को राष्ट्र - प्रेम दरकार नही है
मैं गरीब हूँ, राजनीति से मेरा सारोकार नही हेै।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग
मो098973998
rajendrakikalam.blogspot.com

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