Tuesday, June 7, 2016

हास्य,व्यंग के साथ भविष्य में होने वाले खतरे के प्रति सचेत कर रहा हूं, रचना लम्बी है ,क्षमा के साथ,अवश्य पढें)

अमेरिका का सपना
अमेरिका हूॅं दुनिया - भर के भिखमंगों को पाल रहा हूॅं
समृद्व - राष्ट्र की कमजोरी और लाचारी खंगाल रहा हूॅं
छल,बल,कपटी राजनीति का कातिल, शातिर, माहिर हूॅं
अलसायी, व्यवसायी दुनिया के धन्धे में जग जाहिर हूॅं

छोटे - छोटे टुकडे़ करके खेल खिलाना मेरा शौक है
आज मेरा घर दुनिया भर की नीलामी का नया चौक है
मेरे दर में भीख माॅंगते सभी राष्ट्र और देश खडे हैं
मेरे कारण दुनिया भर में राजनीति के लाख धडे़ हैं

तहस - नहस हो दुनिया सारी ,मैं विस्फोटक फैलाता हूॅं
आग लगाकर घर - घर में, मैं ज्ञानी, दानी कहलाता हूॅं
मौतों का सामान बेचना , ये मेरी दुनियादारी है
चरण चूमना मेरे , सब की मजबूरी है, लाचारी है

प्रतियोगिता हर धन्धों में , शदियों से मैं करवाता हूॅं
मजदूरों की इस दुनिया में बैठ - बैठ कर मैं खाता हूॅं
पहले मैं आतंकी पैदा करता हूॅं, फिर मरवाता हूॅं
मैं दुनिया में कपट कराकर शान्ती दूत बन कर आता हूॅं

कहा-कहाॅं, क्या-क्या होता है,निगरानी सबकी करता हूॅं
निर्बल की रक्षा करने की ,आडों में सैना भरता हूॅं
पूरब, पश्चिम , उत्तर ,दक्षिण मेरी दहशत् से जीता है
मैं कलियुग का गिरधारी हूॅं, घर-घर में मेरी गीता है

हिन्दुस्तानी, पाकिस्तानी कठपुतली का सूत्र-धार हूॅं
दोनो आपस में लडते है, मैं दोनो का वफादार हूॅं
परम्परा गत संस्कारो में जहर भयंकर डाल रहा हूॅं
ब्रह्म - जगत में जीने वाले भले भिखारी पाल रहा हूॅं

खाडी और पहाडी अरबी दुनिया को मैं मार रहा हॅूं
दुनिया भर के भूखे, नंगे, मुर्दों का अवतार रहा हूॅं
वेद,शास्त्र और उपनिषदों में धरती का पाताल लोक हूॅं
अधोगति में मरने वालों का भी तो, मैं महाशोक हूॅं

प्रतिष्प्रधा में जर्मन और जापन, चीन को भाॅंप रहा हूॅं
विश्व जगत की अर्थव्यवस्था में भी,मैं अभिशाप रहा हूॅं
हर धन्धो में अर्थ - व्यर्थ, चौपट करने का कलाकार हॅूं
दुनिया भर के सरपंचो की चैपालों का सलाहकार हूॅं

वालमार्ट की चमक धमक से राजनीति को समझाउंगा
खेती,बाडी और किसान को मैं ही सडकों पर लाउंगा
खुदरा , मुद्रा, भी तोडूंगा़ अपने डालर की भाँषा से
अमरीका की मुहर लगेगी अमरीका की अभिलाषा से

रोजगार विहीन बना कर मैं ही भारत को पालूॅगा
इस महाद्वीप के युद्व-पोत के अड्डो को मैं खगालूॅगा
जापान,चीनऔर रशिया को भी टुकडों-टुकडों में तोडूंगा
मैं एशिया - महाद्वीप को, नैपाल बना कर ही छोडूॅगा

अमरीका से हाथ मिलाया, रुश, चीन नाराज हो गये
खुल्लम खुल्ला,मुस्लिम देशों के तीखे अल्फाज हो गये
बिना स्वार्थ के कौन किसी को घास देश में डाल रहा है
बिन मतलब के आज पुत्र भी कंहा पिता को पाल रहा है

अब मोदी मेरा सहयोगी है, मार्च नही, अप्रेल चलेगा
जापान की रेल चलेगी, मेरा भी कुछ खेल चलेगा
भारत के उद्योग - जगत को भीख मांगते देख रहा हूं
अच्छे दिन आने वालें हैं ,मैं भी टुकडे फैंक रहा हूं

इस कलियुग में छल,बल,कपटी,रंगमंच जंजाल रहा हूॅं
अमरीका हूॅ दुनिया-भर के भिखमंगों को पाल रहा हूॅं
इस रचना में हास्य - व्यंग है, चिन्तन की गहरायी है
अमरीका के उदार - वाद में, देखो कैसी चतुरायी है

शदी अन्त तक पूरा परचम इस दुनिया में लहराउॅंगा
मैं ही दुनिया पाल रहा हूॅ, मैं ही दुनिया को खाउॅंगा
भीख मांगकर मरगें सारे,मुझको कोई समझ ना पाया
राष्ट्रभक्ति के इस खतरे को, कवि आग ने खुलकर गाया।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

No comments:

Post a Comment