सत्यता को कर्कशता से लिखने का प्रयास किया है
शब्द सम्भाल कर बोलिये, शब्द के हाथ ना पांव
एक शब्द करे औषधी, एक शब्द करे घाव
भांषा का तमाशा
पी.एम.के भाषण में अब वो पी.एम.वाली बात नही है
सब को लेकर साथ चलेंगे ऐसे भी जज्बात नही हेै
मर्यादा की सीमाओं को शब्द स्वयं ही लांघ रहे हैं
नुक्कड नाटक के ये भाषण,स्वाभिमान को टाँग रहे हैं
लोकल चर्चा,और चुनाव से थोडा बचकर चलना होगा
अगर देश के मालिक हो , घाव में मरहम मलना होगा
डबरो में घुस कर सरितायें मर्यादा खोती जाती हैं
केवल हल्की - फुल्की जनता को ऐसी भांषा भाती है
गम्भीर स्वरों को सुनने वाले अभी राष्ट्र में बचे हुये हेैं
हर प्रान्त में चिन्तन मन्थन वाले अब भी रचे हुये हैं
राजनीति में व्यभिचार की ऐसी क्यों भरमार मची है
उँचे पद पर अप-शब्दो से देश की इज्जत कंहा बची है
तुमने जो कुछ भी बोला है, प्रतिद्वन्दी भी कुछ बोलेगा
तुमने उसके कपडे खोले, मौके पर वो भी खोलेगा
शब्द द्वन्द की इस क्रिडा से भारत माता ही रोती है
आज राष्ट्र को राजनीति की नालायक पीढी ढोती है
पी.एम.के भाषण को सारी दुनिया टी.वी.पर सुनती है
अच्छे - बूरे हर शब्दो की भाव-भंगिमा को चुनती हेै
जिस कुर्सि पर तुम बैठे हो ये भारत का स्वाभिमान है
तेरे मूँह से निकलने वाला शब्द नही हैे,राष्ट्र-गान है
एन.एस.जी की भाग दौड में आखिर तुमने क्या पाया है
हर चैनल पर चमक रहे थे, केवल वक्त हुआ जाया है
तेज दौडने से हर धावक अपनी ही शक्ति खोता है
कूटनिती में चलने का प्रमाण पहुंचना ही होता है
तेरे ही घर के सब बाबा, तेरी इज्जत चाट रहे हैं
संविधान के हर पन्ने पर चाट, पकौडी बांट रहे हैं
सुब्रमण्यम् स्वामी जी तो, खुले साण्ड से गुर्राते हैं
आदित्यनाथ और प्राची,साक्षी अपनी ही धुन में गाते हैं
मैं तो छोटा सा रचनाकर अपनी भांषा बोल रहा हूँ
तुम्हे राष्ट्र के संवादो के सम्भावों से तोल रहा हॅूं
कवि आग हूँ सच्चाई को कहने में परहेज नही है
अगर किरण में भेद-भाव है,तो भानू का तेज नही है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग
मो098973998

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