Monday, June 6, 2016

डण्डा उँचा रहे हमारा
राष्ट्र-ध्वजा में तीन रंग है, नेता सारे रंग - बिरंगे
झण्डा , डण्डा ढांक रहा है, पर ये सारे नेता नंगे
राष्ट्र गान और राष्ट्रगीत में राजनीति के फिर भी पंगे
राष्ट्र, धर्म, मजहब के झण्डे, गंगा मैली हर-हर गंगे

हिन्दू, मुस्लिम ,सिक्ख ईसाइ अपने झण्डे उठा रहे हैं
कौम,कबीले,क्षेत्र, जातियां, भीड स्वयं की जुटा रहे हेैं
आन,बान,सम्मान दाव पर,खुद की इज्जत लुटा रहे हैं
राष्ट्र -धर्म को झण्डे, डण्डे, और मुस्टण्डे मिटा रहे हैं

भारत माता की जय बोलो, इस पर भी पंगा होता है
सम्प्रदाय, मजहब का नेता सडकों पर नंगा होता है
राजनीति में युवा गधा भी, झण्डो का बोझा ढोता है
मेरा भारत ध्वजा दण्ड के हथ-कण्डो से ही रोता है

राजनीति के लाखों झण्डु, अपने झण्डे तान रहे हैं
धर्म-ध्वजा भी भारत मां को नगर वधू ही मान रहे हेैं
राष्ट्र,धर्म, भगवान गौण है, झण्डा ही पहचान रहे हैं
राजनीति और धर्म नशे में ,भांग सियासी छान रहे हैं

डेढ अरब की जनसंख्या को, झण्डे ही अब ढांक रहे हेैं
कोैम,कबीले,मजहब,जातियों झण्डें से ही आंक रहे है
झण्डो से ही प्रजातन्त्र के बोट-बैक को भांप रहे हैं
राजनीति के सारे दर्जी, जनमत संग्रह नाप रहे हैं

मंहगायी,भुखमरी,गरीबी ,इन झण्डो से ढक जाती है
झण्डो से ये मरी जवानी, व्यथा राष्ट्र की बक जाती है
झण्डा कफन बनाकर हमने,भारत गौरव गान किया है
कवि आग ने इन छन्दों से, झण्डाें काें अनुदान दिया हेै।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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