Sunday, June 12, 2016

कवि और नेता
नेता में और कविता में बस फर्क यही है
आत्मसात् होता है कवि, मस्तिष्क नही है
जनता , नेता की सत्ता है , जोत बही है
कविता ने तो सतत् सत्य की बात कही है

कवि, नेता दोनो को भीडें ही भाती हैं
कवि सूक्ष्म जीव है, नेता तो तस्कर हाथी है
इनको तो बस लंच ,मंच , प्रपंच चाहिये
प्रजातंत्र की भीडों के सरपंच चाहियें

राजनीति और कविता जनता से पलती है
कवि श्रेष्ठ है ,नेता जनता की गलती है
जनता कविताओं से खुश है, खेल रही है
राजनीति के दंश दशक से झेल रही है

राजनीति के दल में दल-दल गन्ध भरा है
नेताओं में भ्रष्ट आचरण, आज खरा है
अलंकार,रस,छन्द चरण कवि अर्पण करता
श्रृष्टि संरचना कैसी हो, छवि दर्पण धरता

तुलसी सूर, कबीर राष्ट्र की अमुल्य निधि है
धर्म मजहब निर्पेक्ष बने, बस! एक विधि है
राजनीति मजहब के डबरे खोल रही है
जाति-पांति का जहर जगत में घोल रही है

आजादी का गीत कवि ने ही गाया था
स्वाभिमान का पथ भारत को दिखलाया था
भीडो में बस ! नेता शक्लें दिखलाते है
फसल हमारी, काट-काट कर ये खाते हैं

सूर्यकान्त त्रिपाठी , दिनकर और निराला
राष्ट्र-गीत को बकिंम, रविन्द्रनाथ ने पाला
श्रृंगार , रोद्र को, वीर रसों में ढाल रहे थे
आजाद हिन्द को,हम कविता से पाल रहे थे

अब तो ये वेतन भत्तों पर भी जीते हैं
हम सींचते लहु वतन पर , ये पीते हैं
आदर्श कवि है , मंचो पर मन भावन,सावन
ये राजनीति मारीच, कहीं लंकापति रावन

नेता जी! तुम राष्ट्र - गीत को भूल गये हो
सत्ता और शियासत , मद में फूल गये हो
आत्म ग्लानि की पीडा से , कविता रोती है
क्यों राजनीति और कविता मंचों से होती है?

जनता को कवि कविता में रस दिख जाता है
राजनीति में नेता बातों की खाता है
राष्ट्र सृजन श्रृंगार नियन्ता कवि होता है
इतिहास गवाह है नेता से भारत रोता है
  राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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