मैं तुरंग हूं
मैं तुरंग हूं,आदिकाल से भारत का स्वाभिमान रहा हूं
सतयुग,त्रेता,द्वापर,कलियुग रण कौशल गुणगान रहा हूं
चक्रवती सम्राटो का मैं अश्व - मेध की शान रहा हूं
राणा,पुतली, वीर शिवाजी, की भी मैं पहचान रहा हूं
मैं गरीब की रोजी -रोटी भी सडको पर छान रहा हूं
मैं तुरंग हूं,आदिकाल से भारत का स्वाभिमान रहा हूं
स्वाभिमान में जीने वालों ने मेरा उपयोग किया है
डाकू और लुटेरों ने भी मेरा ही उपभोग किया हेै
पुलिस, मिलिट्री, अर्द्ध बलों में मेरा परचम लहराता है
सरहद पर मरने और मिटने वालों से मेरा नाता हेै
स्वाभिमान के कारण अब तक समरस सीना तान रहा हूँ
मैं तुरंग हूं,आदिकाल से भारत का स्वाभिमान रहा हूं
मुगल, हूण, अंग्रेजो का भी मैं ही सच्चा मीत रहा हूँ
भारत में तो रण-कौशल का हर युग में संगीत रहा हूँ
तांगा, टट्टू, टम - टम गाडी को मैने हरदम ढोया है
हर गरीब की रोजी-रोटी में जीवन अपना खोया है
मैं कुम्हार का बोझा ढोकर खाक सडक की छान रहा हूँ
मैं तुरंग हूं,आदिकाल से भारत का स्वाभिमान रहा हूं
ये घोडे, खच्चर, गघे जेबरे सब मेरी सन्तान रही हैं
कौम ,कबीलो के पालन में मेरी ही पहचान रही है
घुड-दौड में जूँवे - सट्टे से दुनिया को पाल रहा हूँ
भले जुवारी के चरणो में खुद का जीवन डाल रहा हूँ
शादी-विवाह,निकाह, सवारी में, मैं सबकी शान रहा हूँ
मैं तुरंग हूं,आदिकाल से भारत का स्वाभिमान रहा हूं
देव-दानवो के मन्थन में, मैं नौ - रत्नो मे एक रहा हूँ
मैं तुरंग अब घोडा बनकर अश्रु धरा में फेैंक रहा हूँ
पराधीन होकर मैं अब भी मानव के कोडे खाता हूँ
वैेमनस्य की राजनीति में चौराहे में मर जाता हूँ
मैं कवि आग भी मानवता मे पशू को सस्ता जान रहा हूँ
मैं तुरंग हूं,आदिकाल से भारत का स्वाभिमान रहा हूं ।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815

No comments:
Post a Comment