Thursday, May 5, 2016

जवानी की नादानी
भारत में यौवन तो पर यौवन का आभाष नही है
भरी जवानी भी दिखती है पर जीवन कुछ खास नही है
परम्परा का वजन हमेशा गधे बने हमने ही ढोया
मरी हुयी मर्यादा के शव देख - देख कर जीवन खोया
तृप्त वाशना की यौवनता,ये जीवन की प्यास नही है
भारत में यौवन तो पर यौवन का आभाष नही है

व्यभिचारी और भ्रष्टाचारी, चोर उचक्के घूम रहे हैं
हर डाकू के पीछे - पीछे देखो यौवन झूम रहे हैं
अहिसुष्णता को जीवन भर हम कन्धे पर ढोते आये
भरी जवानी के निष्फल, फल नेताओं ने मिलकर खाये
हम जवान है, पर जवान के,इतना भी हम पास नही है
भारत में यौवन तो पर यौवन का आभाष नही है

कंही बोफार्स,कंही कोलगेट,कंही आगस्ता की हेराफेरी
व्यापम,पापम,ललितमोदी,की माल्या की भी लूट घनेरी
सारे नेता लूट - पाट का सौर्य सियासी दिखा रहे हैं
भारत के मुर्दा यौवन को अहिसुष्णता सिखा रहे हैं
भारत में क्या राजनीति ही नई पीढी का नाश नही हेै
भारत में यौवन तो पर यौवन का आभाष नही है

कोर्ट ,कचहरी, न्यायाधीशों पर भी अब विस्वास नही है
न्यायालय से न्याय मिलेगा,अब जनता को आस नही है
स्वाभिमान से इस भारत मे चोर,उचक्के ही जीते हेै
इस पजातन्त्र के फटे लिबासो को ये डाकू ही सीते है
हम जैसे परहीन परिन्दो का भारत आवास नही है
भारत में यौवन तो पर यौवन का आभाष नही है

राजनीति की वैमनस्यता पूरा भारत तोड रही है
मंहगायी, भुखमरी गरीबी अपने ढंग से जोड रही हेै
हर चैनल में बे-मतलब के टुच्चे नेता झगड रहे हैं
टुच्चे तर्को और कू - तर्को से सम्पादक अकड रहे हैं
जानवरो सा चबा रहे हो क्या ये यौवन घास नही है
भारत में यौवन तो पर यौवन का आभाष नही है

अगर देश में यौवन होता तो ये टुच्चे पनप ना पाते
चोर डाकुओं के ये बीहड,संविधान की शपत ना खाते
जमाखोर और माल मिलावट,घोटालों की बात ना होती
यौवनता के मरूधानो में, मरूस्थल की घात ना होती
कवि आग हम संभल गये तो ये यौवन उपहास नही है
भारत में यौवन तो पर यौवन का आभाष नही है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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