Saturday, May 28, 2016

राष्ट्र के भक्षक,राष्ट्र के रक्षक
क्यों सारे नेता इस भारत को स्वर्ग बनाना चाहते हेैं
क्यों अपने-अपने उपन्यास,उपसर्ग बनाना चाहते हेैं
क्यों राजनीति के दल हजार,वृत-वर्ग बनाना चाहते हेैं
क्यों लगता है सब काशमीर,गुलमर्ग बनाना चाहते हैं

एके देश का संविधान है, फिर भी देखो खींचा तानी
भारत की सारी नदियां हैं, सबका अपना-अपना पानी
सारी धरती जुडी हुयी हैअलग प्रान्त की अलग कहानी
तैंतिस कोटि देव की धरती,सबके अपने-अपने ज्ञानी

36 प्रान्त की भारत माता लुटि-पिटि दुख झेल रही है
हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख,इसाई से रो-रो कर खेल रही है
बोली,भाँषा,संस्कारो से सिसक-सिसक कर हांप रही हेै
भारत माता हिन्दुस्तानी बच्चों से ही काँप रही है

कहने को तो लोकतन्त्र है ,पर जनता तो दास हो गयी
बोट-बैंक की राजनीति से मानवता उपहास हो गयी
मर्यादा, संस्कार, संस्कृति नेताओ से नाश हो गयी
भारत मां की बंजर धरती प्रजातन्त्र की खास हो गयी

भुखमरी,गरीबी,बे-राजगारी के घर-घर अम्बार लगे हेैं
शब्दों के सोैदागर सारे डाकू इज्जतदार लगे हेैं
लावारिस खेती को चरने,सब पशुओ के डार लगे हेैं
इस बीहड में देश लूटने बाले सब अवतार लगे हेैं

सत्ता और विरोधी दोनो मिलकर कच्छे खोल रहे हैं
मुर्दे नेता, मुर्दा जनता भारत की जय बोल रहे हेैं
जनता की औकात सियासी,अपने ढंग से तोल रहे हैं
अधिकारी, व्यवसायी, साधू, आवारा हैं, डोल रहे हैं

राष्ट्र सुरक्षा की चिन्ता है फिर भी देखो झगड रहे हेेैं
लोकतन्त्र के मन्दिर में भी भक्त,भक्त को रगड रहे हेैं
अहिसुष्णता फैल रही है कंही कुशल और क्षेम नही हेै
कवि आग इन नेताओं का,भारत से कुछ प्रेम नही हेै।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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