Tuesday, May 31, 2016

सियासत का हथियार
तुम भी अपने घर को देखो, मैं भी अपना घर देखूंगा
तुम भी जुमले फेंक रहे हो, मैं भी जुमले ही फेकूंगा
जनता को बेवकूफ बनाकर ही तो हम सत्ता पाते हैं
अपशब्दो के तीर चलाकर अपना राष्ट्र गीत गाते है

मैं सबूत मांगूगा तुमसे ,तुम कहना मैं देख रहा हूँ
तुम हमसे आतंकी मांगो, मै बोलूगा फेंक रहा हूँ
चार दिनो का हल्ला गुल्ला,जनता सब कुछ भूल जायेगी
फिर अगला विस्फोट करेंगे,कुछ दिन तक उसको गायेगी

अच्छी-अच्छी नश्ल के तोते हर चैनल में चुनकर डालो
अच्छे-अच्छे,जुमले, भाषण, तर्को से जनता को पालो
हिन्दू, मुस्लिम, कौम, कबीले ये ही तो अपनी खेती है
सम्प्रदाय,मजहब की क्यारी, बिन माँगे सब कुछ देती है

तेरे संघी मेरे मुल्ले इस नेक काम में लगे हुये हैं
दोनों मुल्को की जनता भी जान रही, हम जगे हुये हैं
साठ साल तक कांग्रेस ने यही खेल मिलकर खेला है
तेरी जनता भी मंजनू है, मेरी जनता भी लैला हेै

अपना खेल चलाकर तुमने परदेशों में ख्याति पायी
तेरे कारण मेैंने अपने घरवालों की गाली खायी
चमत्कार है ,हम दोनों को फिर भी जनता मान रही है
मुर्दा जनता हम दोनों के कारण सीना तान रही है

कुछ तुम मूझसे,कुछ मैं तुमसे जनमत के जुमले सीखेंगे
अल्लाह की मेहर होगी तो सत्ता में फिर से दीखेंगे
काशमीर दोनों मुल्कों को राजनीति वरदान मिला है
मुझको पाकिस्तान मिला है,तुमको हिन्दुस्तान मिला है

संसद,बम्बई,पठानकोट और सरहद पर भी कुछ होता है
अब रावलपिण्डी, राँची मेरी कब्रें, मस्जिद को ढोता है
खेल बराबर ,दोनो मुल्को का, तब तक जेहाद चलेगा
कवि आग आतंकवाद तो, राजनीति में खूब फलेगा।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com 

No comments:

Post a Comment