विनय-पत्रिका
बैलों को मैने देखा हैे , हल में खुद ही जुड जाते हैं
खुद ही बिन चाबुक के रथ में अश्व स्वयं ही मुड जाते हैं
कौन सीखाता है कुत्तों को, घर की चैकीदारी करना
कैसी फितरत राष्ट्रभक्त की सरहद पर मिटना और मरना
जानवरों से बदतर जीवन आज आदमी क्यों जीता हैं
नरभक्षी मानव को देखो लहु ,स्वयं का क्यों पीता है
खग-मृग को जंगल में देखो ,कैसे गीत प्यार के गाता
कौन मदरसा प्रेम-प्यार की शिक्षा-दीक्षा उन्हे सीखाता
आज जगत की शिक्षाओं से घर मशान क्यों बनजाते हैं
पढे लिखे यौवन को देखो,वतन बेच कर क्यों खाते हैं
कुछ तो है बुनियादी कारण, शदियों से भटकाते आये
क्यों उठतें हैं स्वर विरोध के कोई तो हमको समझाये
सतयुग,त्रेता, द्वापर, कलियुग में भी ऐसा ही चलता था
संस्कारों से दबा हुआ मन, मानवता से ही पलता था
हर विद्रोही स्वर के उपर ,सत्य सतत भारी होता था
कारण था जर , जोरू, धरती ,बीज सदा से ही बोता था
पशू से उपर मानवता को आज जगत क्यों मान रहा है
अन्वेषण को अस्त्र बना कर, मानव सीना तान रहा है
आविष्कारों की शिक्षा से मानवता क्यों मर जाती है
सृष्टि - संरचना तालीमों की विस्फोटो की कहलाती है
मानवता की इस तुलना में गधा बैल कुत्ता सुन्दर है
संस्कारों के समय चक्र में फॅंसा हुआ ये कैसा नर है
विनय - पत्रिका भेज रहा हूॅं इस दंगल को मंगल कर दो
दूर करो इस मानवता को, जानवरों का जंगल कर दो।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815

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