नेता और कानून
न्याय पालिका,कार्य पालिका में भी अब संग्राम मचेगा
मेरे देश का नेता देखो कंहा- कंहा कोहराम रचेगा
माल, मशालेदार फैसले सब संसद में ही निपटेंगे
टुच्चे - मुच्चे सारे झगडे कोर्ट, कचहरी में चिपटेंगे
न्यायालय में संविधान के पन्ने सब नीलाम हो गये
कानूनो की इस मण्डी में अधिवक्ता ही आम हो गये
जज, मुजरिम, बैरिस्टर सारे बिकने को तैयार खडे हैं
नीचे से उपर तक सबके अपने - अपने तार जुडे हैं
क्यों सारे नेता अधिवक्ता है, अधिवक्ता नेता होते हेै
प्रजातन्त्र को संविधान के जीर्ण - सीर् पन्ने ढोते है
न्यायाधीश भी बदल रहे हैं, राजनीति के दरबारों से
संसद की नौका नतमस्तक कांप रही है पतवारों से
भारत -भाग्य- विधाता सारे डाकू बीहड बना रहे हैं
संसद के मन्दिर में अपनी ईद, दीवाली, मना रहे हैं
दोना सदनो के सर्कस में जोकर नाटक खेल रहे हैं
हम तमास-बीन है डेढ अरब के बोट-बैंक को, झेल रहे हैं
ललित गेट,कंही कोलगेट,कंही व्यापम, पापम कलमाडी
कही विजय माल्या, आगस्ता ,ये नेता की खेती बाडी
स्मृति रानी हार गयी है , सत्ता -सुख से खेल रही है
अरूण जेतली भी हारा है , फिर भी सत्ता झेल रही हेेै
कुछ टूटे - फूटे राज्यपाल अपशिष्ठ, सियासी आते हेैं
छल-बल-कपटी अनुभव के ,ये भजन सियासी गाते हेै
फिर लगती है आग यंहा पर प्रजातन्त्र गलियारों में
क्यों जीर्ण -शीर्ण से धृतराष्ट्र भी पलते हैं सरकारो में
कानून जंहा पर अन्धा हो,वहा न्याय-पक्ष की आस नही
न्याय जंहा पर बिकता हो,वो न्यायालय का न्यास नही
चरित्र हीन को चरित्रवान सम्मान न्याय से मिलता हो
जहा राष्ट्र-द्रोह के कारण ही सत्ता से राष्ट्र संभलता हो
कानून जंहा पर कानूनो को, कानूनो से ही काटेगा
न्याय जंहा पर जनमत से ,जन-जन का जनमत बांटेगा
जहा संविधान के पन्नोे से सम्भ्रान्त निकम्मे पलते हैं
कवि आग कानून वंहा, शव, लाश ,कफन से जलते हेैं।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815

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