पहाड - प्रकृति - प्रकोप
रुख तो हवायें बदलने लगीं हैं
किरण सोम ज्वाला उगलने लगीं हैं
जाडे में हिम क्यों पिघलने लगीं हैं
बुनियाद पर्वत की हिलने लगीं हैं
इशारा करम का नजर आ रहा है
धरम् में भरम् का असर आ रहा है
झटकेां से दुनिया हिली जा रही है
अचरज है जीवन जमीं खा रही है
इच्छायें कौमौ को कैसे हटाती
क्षणभर में कुदरत सब कुछ मिटाती
जल-थल मरुभूमि में है बदलता
झटकों से पलभर में दिल दहलता
हर वर्ष कुदरत नमूना दिखाती
इशारे से परिणाम भी है बताती
जबरदस्ती इन्शान क्यों कर रहा है
जाने बिना बात क्यों मर रहा है
प्रकृति हटेगी तो प्रलय घटेगी
जमीं सागरों, शिखरों में बंटेगी
कुदरत तुला है, जीवन जमीं में
संहार होता है नर की कमीं में
जिसने भी श्रृष्टि को छेडा या तोडा
कहावत है नाशूर बनता है फोडा
आकाल जीवन जमीं खा रहा है
दुनिया का अन्तिम समय आ रहा है
विज्ञान, कब तक देगा सहारा
हमने तो, मौतों खुद ही पुकारा
ये जंगल,जमीं, नभ सब जल रहा है
मौतों से मानव मरा पल रहा है
हटे सभ्यता तो कुदरत बचेगी
श्रृष्टि पुनः दिव्य मानव रचेगी
ये शोले, ये शबनम, धूंआ बोलता है
कवि आग, अग्नि शिखा खोलता है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815

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