बाल- दिवस
क्या चाचा नेहरू आयेंगे इन्साफ करेंगे
आंगन बाडी के बच्चे अब सन्ताप करेंगे
उंची - उंची नस्लो के ही तो बच्चे पढते है
लावारिस तो आंगन बाडी में सढते है
बस, गेंहू , चावल, चीनी, भूखे चाट रहे है
सरकारी खैरात सियासी बांट रहे है
भविष्य देश का आंगन बाडी चला रही है
अब राजनीति नादान शिशू को गला रही है
सरकारी शिक्षा चपरासी और मेठ बनाये
कानवेण्ट से अधिकारी ही चुनकर आये
अब बाबू, माली, चालक, चौकीदार खिलेंगें
इन फटे लिबासों को, सरकारी स्कूल सिलेंगे
अच्छा होता पाठ्यक्रम सब एक बनाते
बालदिवस पर चमत्कार कुछ कर दिखलाते
पट जाती खाई, निर्धन और धनवानो की
एक ही शिक्षा होती, शौकत और शानो की
हमने देखो शिक्षा को भी व्यवसाय बनाया
के. जी. में क्यों तीन वर्ष का ,बच्चा आया
कमर में बस्ता पांच शेर का ,शिशू ढोता है
कोमल कलियों का कलरव कलुसित होता है
क्या गुनाह किया है बच्चों ने,जो कष्ट उठाते
सपने, मात पिता के ,क्यों बच्चों को खाते
व्यवसायी तो , शिक्षा का , पैसा पाता है
स्कूल मदरसों से , कोमल मन मुरझाता है
बच्चों की कोमल बुद्वि में भी मल भरता है
भविश्य देश का शिक्षा से कैसे मरता है
रट्टू तोता बच्चा कैसे बन जाता है
दिल, दिमाग की दुनिया में ही खो जाता है
मासूम कलि को निर्दयता से अब मत तोडो
पांच साल तक बच्चों को बच्चों पर छोडो
इन कलियों से चमन भी सुन्दर बन जायेगा
यौवनता के गीत वतन फिर से गायेगा
बाल दिवस को काल दिवस बनने से रोको
मासूम शिशू ना शिक्षा की भट्टी में झोंको
ऋतु आने पर फल में रस आ ही जाता है
बस, कवि आग उस शैशवता को ही गाता है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग
मो098973998
rajendrakikalam.blogspot.com

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