Friday, November 27, 2015

धर्म-निर्पेक्ष
संविधान की चर्चा वालो अपने भीतर भी झाँको
धर्म,मजहब से मानवता के गिरे मुल्य को भी आँको
हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख,ईसाइ की रचना के रचनाकारों
सम्प्रदाय की चिन्गारी के शोले, शबनम से अंगारों

वध, जेहाद, फसादों की ये भांषा धर्म नही होती
मजहब कौम, कबीलो की अभिलाषा जुर्म नही होती
सम्प्रदाय का मतलब ही है समता के व्यवहारी हों
धर्म लक्ष्य हो चलने वाले मजहब आज्ञाकारी हों

राम, कृष्ण हो ईशा, मूसा, चाहे पीर मुहम्मद हो
धर्म-ग्रन्थ गीता, कूरान हो,महावीर हो,धम्म-पद हो
सत्य,अहिंसा,दया, प्रेम हो ,पन्थ स्वंय बन जाते हैं
हर मजहब के, सम्प्रदाय के सूत्र यही बतलाते हैं

निर्पेक्ष धर्म क्यो संसद के गलियारो में दोहराते हो
क्यों अपनी परिभाषाओं से मजहब को सहलाते हो
सम-विधान हो भारत में,बस, ये कर्तव्य जरूरी है
कर्तव्य परायण मजहब हो, बस,धर्म मध्य मे धूरी है

राजनीति में जनमत को अब वोट-बैंक से मत तोलो
मानवता में वैमनस्यता की परिभांषा अब मत बोलो
क्षेत्र,जाति की चिन्गारी से,अखण्ड-राष्ट्र को मत फूंको
खुले व्योम पर काम,क्रोध,मद,लोभ,मोह से मत थूको

राजनीति में अपने - अपने धर्म -भाव को पहचानो
मन्दिर,मस्जिद,गुरूद्वारा,गिर्जा भी संसद को मानो
अपने-अपने धर्म, कर्म से राष्ट्र भक्ति को अपनाओ
कवि आग की विनती है बस,भारत को अब ना खाओ।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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