Saturday, November 14, 2015

विदेश नीति
नैपाल गया,बंगाल गया, घर का भी सारा माल गया
पाकिस्तानी झण्डो से, नतमस्तक भारत भाल गया
अगल-बगल के चूहे भी बुनियाद देश की खोद रहे हैं
भारत मां के बच्चे ही, अब मां का सीना गोद रहे हैं

जिन से हाथ मिलाते हैं, अब वो ही घात लगाते हैं
सब राजनीति में वैमनस्य ये प्रजातन्त्र सौगाते हैं
इस लोकतन्त्र के बीहड में डाकू ही शोर मचाते हैं
क्यों प्रजातन्त्र के सर्कस में जोकर ही चुनकर आते हैं

डेढ अरब की भीडों ने क्यों भारत मां को चाट लिया
मजहब,कौम,कबीलों में क्यो घर-घर भारत बांट दिया
अब भी जमघट लगे हुये हैं टुकडे और बनाने को
ये राजनीति तैयार खडी है राजतन्त्र को खाने को

इस उदारवाद की नीति से हम लुटे, पिटे से खडे हुये
आजाद देश में रहकर भी गुमनाम ,गुलामी जडे हुये
प्रजातन्त्र में जनता भी षडयन्त्र सियासी झेल रही है
आज जवानी भारत की लावारिस प्यासी खेल रही है

सोने की चिडिया का भारत भीख मांग कर खायेगा
राम, कृष्ण का धाम आज पश्चिम के गाने गायेगा
मजहब, कौम, कबीलों में क्या धर्म यंहा बंट जायेगा
हिन्दू, मुस्लिम झगडो में क्या राष्ट्र खडा कहरायेगा

नेता का लक्ष्य सियासत है जिसका हमको आगाज नही
भुखमरी,गरीबी,मंहगायी का इनको कुछ अन्दाज नही
जनता से इनको क्या लेना,ये जनमत जख्म जखीरा है
बस,कवि आग के शब्दो में ये भारत ढोल, मंजीरा है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग
मो098973998
rajendrakikalam.blogspot.com

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