भारत के संविधान शब्द का सामान्यतः शाब्दिक अर्थ सम-विधान मतलब प्रत्येक कानून प्रत्येक व्यक्ति पर बराबर लागू हो, कोई छोटा,बडा,उंच,नीच,धनी,निर्धन जैसी मूल भूत व्यवस्थायें समान होनी चाहिये,परन्तु गरीब गरीब है, धनी धनी है,किसी के पास रहने को घर नही है कोई अथाह सम्पत्ति लेकर बैठा है। आदि बहुत सी अनियमिततायें हैं जो सम-विधान शब्द पर प्रश्न चिन्ह है।
एक आैर क्रान्ती
संविधान के इन पन्नो से भारत माँ शर्माती है
राजनीति की औलादें क्यों कसम उसी की खाती है
कानूनो के इन पंजो में राष्ट्र फंसा कहराता है
सम्प्रभुता में हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख,इसाई भ्राता है
कौम,कबीले,मजहब,जातियाँ उभर-उभर करआती है
अब संविधान के इन पन्नो से भारत माँ शर्माती है
सापेक्ष धर्म , निर्पेक्ष बना कर सभी दुहाई देते है
सम्प्रदाय और मजहब,पन्थ सब अपनी नौका खेते है
मूल - भूत अधिकार मूल में दबा हुआ मर जाता है
शोक मनाता संविधान मुर्दो की गौरव गाथा है
समृद्व राष्ट्र को चोर चकारों की पीढी ही खाती है
अब संविधान के इन पन्नो से भारत माँ शर्माती है
खूनी, कतली, व्यभिचारी, सम्मान राष्ट्र में पाते हैं
राष्ट्र - भक्त क्यों लाचारी में मौन हुये मर जाते हैं
संविधान से भारत - भाग्य विधाता छँट कर आयेंगे
इस प्रजातन्त्र में राष्ट्र-गीत बीहड के डाकू गायेंगे
छोटी - छोटी राजनीति के डबरे सब बर्षाती है
अब संविधान के इन पन्नो से भारत माँ शर्माती है
संविधान के इसी ग्रन्थ ने देश के टुकडे काट दिये
झोपड पट्टी, भाषा, बोली, खोली में सब बाँट दिये
पूरब,पश्चिम,उत्तर,दक्षिण गली मुहल्ला बन जाता है
राम,कृष्ण का आर्यखण्ड भी,भीख माँग कर खाता है
मन्दिर, मस्जिद के झगडे हैं,ना दीपक,ना बाती है
अब संविधान के इन पन्नो से भारत माँ शर्माती है
जिसके मूँह में जो आता है अपशब्दो को बोल रहा है
गुरूकुल और मदरसा शिक्षा की औकातें खोल रहा है
भद्दे - भद्दे शब्द निरंकुश जनमत जनता को भाते हैं
जैसी जनता वैसे नेता बोटों से चुनकर आते हैं
सभ्य राष्ट्र में आज सियासत संविधान संघाती है
अब संविधान के इन पन्नो से भारत माँ शर्माती है
जिस भारत में युवा देश के दर-दर ठोकर खाते हों
भुखमरी, गरीबी, मंहगाई की घर-घर में सौगातें हों
देश की पूंजी, काला-धन परदेश बैंक में संचित हो
कराधान की जनता ही जिस धन से पूरी वंचित हो
मूल-भूत अधिकार सियासत संविधान से गाती है
अब संविधान के इन पन्नो से भारत माँ शर्माती है
समय आ गया संविधान के जर्जर पृष्ठ बदल डालो
संविधान की कसमे खाने वाले धृष्ट बदल डालो
ऐसा संविधान बनवाओ जो भारत का मस्तक हो
व्यभिचार ना बलात्कार की गुंजाइस की दस्तक हो
कवि आग भारत की ममता हर मजहब को भाती है
अब संविधान के इन पन्नो से भारत माँ शर्माती है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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