(हास्य,व्यंग के साथ भविष्य में होने वाले खतरे के प्रति सचेत कर रहा हूं, अवशय पढें)
अमेरिका का सपना
अमेरिका हूॅं दुनिया - भर के भिखमंगों को पाल रहा हूॅं
समृद्व - राष्ट्र की कमजोरी और लाचारी खंगाल रहा हूॅं
छल,बल,कपटी राजनीति का कातिल,शातिर,मैं माहिर हूॅं
अलसायी, व्यवसायी दुनिया के धन्धे में जग जाहिर हूॅं
छोटे - छोटे टुकडे़ करके खेल खिलाना मेरा शौक है
आज मेरा घर दुनिया भर की नीलामी का नया चौक है
मेरे दर में भीख माॅंगते सभी राष्ट्र और देश खडे हैं
मेरे कारण दुनिया भर में राजनीति के लाख धडे़ हैं
तहस - नहस हो दुनिया सारी,मैं विस्फोटक फैलाता हूॅं
घर - घर में, मैं आग लगाकर ज्ञानी, दानी कहलाता हूॅं
मौतों का सामान बेचना , ये मेरी दुनियादारी है
चरण चूमना मेरे ,सब की मजबूरी है, लाचारी है
हर धन्धों में प्रतियोगिता, शदियों से मैं करवाता हूॅं
मजदूरों की इस दुनिया में बैठ-बैठ कर मैं खाता हूॅं
पहले मैं आतंकी पैदा करता हूॅं, फिर मरवाता हूॅं
मैं दुनिया में कपट कराकर शान्ती दूत बन कर आता हूॅं
कहा-कहाॅं, क्या-क्या होता है,निगरानी सबकी करता हूॅं
निर्बल की रक्षा करने की ,आडों में सैना भरता हूॅं
पूरब, पश्चिम ,उत्तर ,दक्षिण मेरी दहशत् से जीता है
कंही ,मुहम्मद, ईशा, मूसा, कंही कृष्ण की भी गीता है
हिन्दुस्तानी, पाकिस्तानी कठपुतली का सूत्र-धार हूॅं
दोनो आपस में लडते है, मैं दोनो का वफादार हूॅं
परम्परा और संस्कारो में जहर भयंकर डाल रहा हूॅं
ब्रह्म - जगत में जीने वाले भले भिखारी पाल रहा हूॅं
खाडी और पहाडी अरबी दुनिया को मैं मार रहा हॅूं
दुनिया भर के भूखे, नंगे, मुर्दों का अवतार रहा हूॅं
वेद,शास्त्र और उपनिषदों में धरती का पाताल लोक हूॅं
अधोगति में मरने वालों का भी ,मैं ही महाशोक हूॅं
प्रतिष्पर्धा में जर्मन और जापन,चीन को भाॅप रहा हूॅं
विश्वजगत की अर्थव्यवस्था में भी,मैं अभिशाप रहा हूॅं
हर धन्धो मे अर्थ - व्यर्थ, चौपट करने का कलाकार हॅूं
दुनियां भर के सरपंचो की चैपालों का सलाहकार हूॅं
रोजगार विहीन बनाकर मैं ही एशिया को पालूॅगा
इस महाद्वीप के युद्व-पोत के अड्डो को मैं खगालूॅगा
जापान, चीन, रशिया, भारत के भी तो मैं टुकडे तोडूंगा
मैं एशिया - महाद्वीप को, नैपाल बना कर ही छोडूॅगा
राष्ट्र-संघ में अमन चैन की कूटनीति मैं करवता हूं
अस्त्र-शस्त्र आतंकवाद को दुनिया भर में पनपाता हूं
राष्ट्र-संघ में शान्ती दूत सब मेरे खुदरा व्यापारी हैं
मार काट जब - जब होती है सम्मेलन सबके जारी हैं
शदी अन्त तक पूरा परचम इस दुनिया में लहराउॅगा
मैं ही दुनिया पाल रहा हूॅ, मैं ही दुनिया को खाउॅगा
भीख मांगकर मरगें सारे,मुझको कोई समझ ना पाया
राष्ट्रभक्ति के इस खतरे को,कवि आग ने खुलकर गाया।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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