आग
कंही हिन्दू में जलता हूॅं कंही मुस्लिम में जलता हूं
सियासत आग की लपटों के साये में ही पलता हूं
वजीरों के ही हाथों से यहाॅं विस्फोट होते हैं
यहाॅं फिरकापरस्ती की , सियासत् , बोट होतें हैं
कहीं पर आग जलती है कहीं, धुआॅं दबाता है
ये र्मुदा रोज पिटता है ,फिर भी मुस्कुराता हैं
यहाॅं चिन्गारियों में भी बस ! पानी निकलता है
इस नार्मदगी को देख कर पत्थर पिघलता है
आॅंशू बहाने के लिये ये ! आग पानी हो गयी
लेकर मशालें हाथ में , भटकी जवानी हो गयी
खो गया वो लुफ्त , जीवन का भरे चौराहे में
भयभीत है ये आदमी क्यों आदमी के साये में
आग
मैं तो कलम में आग हूं, और आग से बेदाग हूॅ
संगीत में सुर राग हूं , तो रंग में भी फाग हूॅ
गन्ध हूं मैं हर चमन में , पुष्प में पराग हूॅ
मैं अभागा आग हूॅं , और आग में अनुराग हूॅं
फूंकता हूॅं हर तरफ से , शुद्व हेाने के लिये
ठोकता हूॅं हर तरफ से , बुद्व होने के लिये
फेंकता हूं ज्ञान जल , अनिरुद्व होने के लिये
खुल के गाता हूॅं भयंकर , क्रुद्व होने के लिये
मेरे देश में ईंधन तो है,पर आग गायब हो गयी
शमशीर में जो धार थी, जाने कहां अब खो गयी
खुशहाल था मेरा कबीला दब गया और मर गया
मरूधान ,मरूस्थल बना कर,आशियाना चर गया
अब तो यौवन का भरोशा, रुग्णता में खो रहा है
आशकी में मर गया बस! लाश ही को ढो रहा है
हर मजहब झगडे.में देखो, बीज कैसे बो रहा है
आग हैे पर आग को भी , देख ईंधन रो रहा है
लुट गया यौवन वतन का, बीथिका चौराहे में
घुट गया संस्कार, पश्चिम सभ्यता के साये में
जो सनातन संस्कृति थी लुप्त होती जा रही हैं
नव अंकुरों सी पीडियां संस्कार खोती जा रही हैं
मेरी कलम में आग है तेरे इलम में आग है
घर घर में देखो नाटको में और फिलम् में आग है
बन्दो में देखेा बंदगी में और बलम में आग है
ये जन्म भूमि छोड. दो योरुसलम में आग है
कौशिश में हूॅं कि फिर लगा दूं आग पूरे देश में
खुद खाक में मिल जायेंगें फिरकापरस्ती भेश में
अस्तित्व भी मिट जायेगा जो खेलता है द्वेश में
फिर दिखेगा शुद्व मानव ‘आग’ में अखिलेश में।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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