Wednesday, November 25, 2015

मानव-धर्म
देश की चिन्ता किसे है राजनीतिक द्वन्द में
रोज झगडे हो रहे हैं, हर जगह मतिमन्द में
आयते शैतान की अपशब्द मुख से बोलती है
औकात हिन्दुस्तान की औलाद ही खुद खोलती है

हर लब्ज में कर्कस किटाणू,मजहबी लिपटे हुये है
सम्प्रदायोें के कबीले शख्स पर चिपटे हुये है
हर शब्द में भी अर्थ अपने हम विषैले छाँटते है
अब मजहबो में आदमी के लोथडे हम बाँटते है

छोडकर कोई वतन को भागने की सोचता है
र्निदयी भी रक्त-रंजित घाव को ही नोचता है
ना समझ इस आग में बस ,धर्म जलता जा रहा है
मानवों को मजहबी और सम्प्रदायी खा रहा है

बाइबिल ,गीता,कुरूआनी लब्ज फीके पड गये है
धर्म के तालाब में बस, आदमी ही सड गये है
क्या मजहबी तालीम से जालिम पनपते जायेंगे
क्या आदमी ही आदमी की आदमियत खायेंगे

अब कोई तो जागा हुआ बन्दा उठे इस भीड से
अब कोई तो अण्डा फुटे इन घोंसलो के नीड से
टूटी कडी सब जोड दे,जो धर्म से बिखरी पडी है
आज मजहब, सम्प्रदायो की परीक्षा की घडी है

जो जातियों, कौमो कबीलों के समय से पार हो
आदमी मजहब बने और धर्म ही हथियार हो
बस,पुष्प हो ऐसे चमन में, गन्ध हो मकरन्द हो
कवि आग हो, संवेदना हो , वेदना स्वछन्द हो।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा ;(आग)
मो09897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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