धधकते-धर्म
मजहब कौम कबीलो वालों एक साथ उठ करके आओ
बच्चे पैदा करने वाले उद्योगो पर रोक लगाओ
स्वस्थ शिशू तो एक ही काफी है जीवन के उपयोगों में
भीडो के अवसाद हटाओ काम - वाशना के भोगों में
जीवन भी सोैन्दर्य बने बस तुम भी सुन्दर बनते जाओ
मजहब कौम कबीलों वालों एक साथ उठ करके आओ
प्रतिष्प्रधा के हिन्दू,मुस्लिम, सिक्ख ,इसाई बनना छोडो
चारों कौमें एक बने बस, भाव हृदय के ऐसे जोडो
उँच,नीच के भेद खत्म हो,इस जीवन की अभिलाषा में
जीवन को आधार बनाओ जीवन की ही परिभांशा में
छोटे - छोटे अंकुर, पौधों में कुछ ऐसी अलख जगाओ
मजहब कौम कबीलों वालों एक साथ उठ करके आओ
अच्छी शिक्षा, दीक्षा, भोजन, पानी, स्वास्थ सुरक्षा हो
केवल मानवता के हाथों से मानव की रक्षा हो
कण्टक परम्परायें छोडो बस भारत निर्माण करो
जिनसे पीढी भटक रही है उनका भी परित्राण करो
वर्तमान में जीना सीखो, इतिहासों पर अब ना जाओ
मजहब कौम कबीलों वालों एक साथ उठ करके आओ
हत्या, वध, जेहाद शब्द को शब्दकोष से दूर करो
मजहब, कौम कबीलों के संस्कार स्वंय से चूर करो
दानवता की इस धरती पर मानव को मजबूर करो
वशुन्धरा पर केवल सुन्दरता के शैशवता शूर भरो
सारे साजों के स्वर संगम समरसता से मिलकर गाओ
मजहब कौम कबीलों वालों एक साथ उठ करके आओ
मार,काट,विस्फोट ध्वनि से धरा को कितना दहलाओगे
मन्दिर,मस्जिद,गुरूद्वारों,चर्चो में भी क्या-क्या गाओगे
धर्म,मजहब की तालीमों से क्यों मानवता मर जाती है
पढी,लिखी पीढी, नर-भक्षी बनकर मानव को खाती है
कवि आग की चिन्गारी से अब ना शोलों को भडकाओ
मजहब कौम कबीलों वालों एक साथ उठ करके आओ।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

No comments:
Post a Comment