भटकती आदमियत
मेरे व्यंग में तो चोट है फिर भी असर होता नहीं
हर तरफ से ठोक कर करता कहर रोता नही
हे ! खुदा अब ये तो बतादे ये नमूना कौन है
पिट रहा है हर तरफ से देख फिर भी मौन है
पुतले खडे हैं आदमी की शक्ल के चौराहे में
औकात तेरी खेा रही हैं आदमी के साये में
उत्कृष्ट रचना आदमी की तू बनाता जा रहा है
ये आदमी तेरे नाम से श्रृष्टि चबाता जा रहा है
अब राजनीति में प्रभू पैदा करो इन्सान को
मरघटों को देखकर जो रो सके तेरी जान को
अब तो तू भी इस जहां में राजनीति कर रहा है
इसलिये तो आदमी की आत्मा से मर रहा है
बन्द करदे श्रृष्टि में अब आदमी की जात को
तू ! कहीं का ना रहेगा मानले मेरी बात को
तू तो सनातन दिव्य है मुझसे ज्यादा जानता है
धन्य है तू जानकर इस जानवर को पालता है
देख ले तू आंख से क्या कर रहा है आदमी
व्याप्त है तू हर मजहब में मर रहा है आदमी
पाप कितना हर दिलों में भर रहा है आदमी
दुकान मजहब की बनाकर धर रहा है आदमी
तेरे मौनसे में सोचता हूॅ आदमी से डर गया है
जिस्म से गायब हुआ लगता मुझे तू मर गया है
खुद लगायी आत्मा की फस्ल को तू चर गया है
मजहबों का भेद लगता दिल में तेरे भर गया है
क्यों मर रहा है बे-गुना भी आदमी के हाथ से
विस्फोट होता है मजहब में धर्म के जज्बात से
है कंही जिन्दा अगर तू, इस आदमी को मोड दे
इस आदमी की कर इबादत, आदमी को जोड दे
अब प्रभू चलकर तुम्ही को खुद यहां आना पडेगा
काट दे जो भेद को वह अस्त्र भी लाना पढेगा
बो दिया तेरे नाम से जो वह तूझे खाना पढेगा
या तो श्रृष्टि को बदल दे या तूझे जाना पढेगा
या तूझे जाना पढेगा ।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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