Saturday, November 14, 2015

आतंक
इस्लाम क्या आतंक का पर्याय है
क्या मजहबों की, मौत ही अब आय है
बे - गुनाहों को फना कब तक करोगे
अब और कितनी लाश धर्मो में भरोगे

ये वारदातें कत्ल की कब तक चलेगी
क्या खून से खलियान की खेती फलेगी
क्या मजहबी तालीम से लाश जलेगी
क्या जालिमो की जात मजहब में पलेगी

आतक की भांषा में गुम-शुम कौन है
इस प्रश्न पर भी क्यों सियासत मौन है
चैनो - अमन की बात दुनियां कर रही है
हथियार बनते हैं तो जनता मर रही है

क्या मजहबों में भेडिये पलते रहेंगे
क्या धर्म भी इन्शान को छलते रहेंगे
क्या हम सियासत में यूं ही जलते रहेंगे
क्या इन दरिन्दो में खुदा ढलतेे रहेंगे

बारूद के इस ढेर में दुनियां खडी है
हर जिन्दगी,जिन्दा कबर में ही गढी है
हर सियासी मौत घर - घर बो रहा हेै
अब ये हूनर भी हूकूमतो से हो रहा है

मुर्दे वतन ,इन जालिमो को ढो रहे हैं
अब अश्क, आँखो में पढे ही रो रहे हैं
जागो ,उठो,अब वक्त तुमसे कह रहा है
आग भी अब इस तपिस को सह रहा है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग
मो098973998
rajendrakikalam.blogspot.com

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