Sunday, November 29, 2015

सियासत
मुद्दतों से आदमी को अब हंसी आती नहीं है
वेदना में प्यार की बातें कभी भाती नहीं है
क्या दिखावे की हंसी से आदमी बच पायेगा
रुग्णता का आदमी अपनी नशल को खायेगा

मन प्रफुल्लित हो हृदय हंसकर हसी को खोलता
यह भावना का भाव है जो मौन होकर बोलता
आदमी की हैसियत को बिन तराजू तोलता
प्रसन्नता का आदमी निश्चल धरा में डोलता

हंसना हंसाना खिल खिलाकर ये दिमागी खेल हेै
अब आदमी के सामने भगवान भी तो फेल है
मैं देखता हूॅं धर्म और मजहब यंहा बेमेल है
कैसे जलाउं द्वीप मैं ना जोत है ना तेल है

सरकटि लाशें सियासत की नुमाइस हो गयी हेै
राजनीति का अखाडा आजमाइस हो गयी हेै
कौन लूटेगा वतन को आज ख्वाइस हो गयी हेै
खादी लिवाशों में डकैती की गुंजाइस हो गयी हेै

देेख लो मेरे देश की संसद अखाडा हो गयी हेै
आज तो मेरे वोट की किमत कबाडा हो गयी हेै
द्वंद सांडो का सदन में खादियों की आड में हेै
ये सांड तो लडते रहेगें देश जाये भाड में हेै

वोट का प्रतिबिंब संसद मे झलकता जा रहा है
वोट से मेरेे वतन को राजनेता खा रहा है
ना समझ का वोट पढता है गधों की पीठ पर
शोभता है सांड सडकों का सदन की सीट पर

मर गयी जनता वतन की इन शवों के साये में
फिर भी मुर्दा बोलता है हर जगह चैराहे में
मरघटों से पाटते हैं हर शहर हर गाांव को
हम पालते हैं शौक से नासूर के इस घाव को

हम अगर चाहे तो ये औकात में आ जायेंगे
इस तरह से नोच कर फिर ना वतन को खायेंगे
मत हमारे हाथ में हिम्मत कहाॅं से पायेंगे
अंकुश लगाना आ गया ये देश के हो जायेंगे

अहिसुष्णता,मंहगायी,भ्रष्टाचार बढता जा रहा है
आदमियत आदमी की धर्म, मजहब खा रहा है
आश्वासन के भरोसे पर वतन ये चल रहा है
किस कदर ये आश्वासन आग को भी छल रहा है!!
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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