योग में सयंम नियम जो खो गया,योगी नही है
गेरूवे में भी सियासत है, तो वो जोगी नही है
आडम्बरों से सत्य और सम्मान भी पलता नही है
आग में ना हो भभक तो स्वर्ण भी गलता नही है
हल्कापन
हे काले धन के मतवाले,अब कंहा है वो बर्छी भाले
क्यों नंगो मे सपने डाले,बस धोखे से अपने पाले
तू खोल रहा था सब ताले,अब कंहा गये वो घोटाले
हे स्वाभिमान के मतवाले क्याें पढे हैं मुंह में अब छाले
मनमोहन मौनी बाबा था,राहुल जर्सी बछडा था
फ्रीजन गाय बनी सोनिया,ये सब तेरा लफडा था
कांग्रेस गद्दार बता कर तू भी रण में कूद गया
हम को तो लगता है बाबा अब तेरा वजूद गया
सूभाष,भगत,शेखर ,अबदुल्ला के तूने गाने गाये थे
चाणक्य खुदी बतला कर तुम चन्द्रगुप्त रण में लाये थे
ऋषि,मुनि के चमत्कार से, अपने को ही तोल रहे थे
इस कलियुग मे सतयुग वाली भांषा बाबा बोल रहे थे
काले घन वालों की सूची,हाथ में लेकर घूम रहे थे
काया,माया की छाया में पागल होकर झूम रहे थे
अच्छी-अच्छी नसल के तोते,वक्ताओं को पाल रहे थे
अष्टांग योग की भट्टी में तुम जनमत को उबाल रहे थे
शास्त्र गवाह है कालनिमि की नकली दाडी,मूछ रही हेै
कालाधन और स्वाभिमान अब जनता तुमसे पूछ रही है
मैने तो बस तेरे शब्दो को ही कविता में गाया है
बुझी हुयी इस चिन्गारी को कवि आग ने सुलगाया हेै।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
rajendrakikalam.blogspot.com
गेरूवे में भी सियासत है, तो वो जोगी नही है
आडम्बरों से सत्य और सम्मान भी पलता नही है
आग में ना हो भभक तो स्वर्ण भी गलता नही है
हल्कापन
हे काले धन के मतवाले,अब कंहा है वो बर्छी भाले
क्यों नंगो मे सपने डाले,बस धोखे से अपने पाले
तू खोल रहा था सब ताले,अब कंहा गये वो घोटाले
हे स्वाभिमान के मतवाले क्याें पढे हैं मुंह में अब छाले
मनमोहन मौनी बाबा था,राहुल जर्सी बछडा था
फ्रीजन गाय बनी सोनिया,ये सब तेरा लफडा था
कांग्रेस गद्दार बता कर तू भी रण में कूद गया
हम को तो लगता है बाबा अब तेरा वजूद गया
सूभाष,भगत,शेखर ,अबदुल्ला के तूने गाने गाये थे
चाणक्य खुदी बतला कर तुम चन्द्रगुप्त रण में लाये थे
ऋषि,मुनि के चमत्कार से, अपने को ही तोल रहे थे
इस कलियुग मे सतयुग वाली भांषा बाबा बोल रहे थे
काले घन वालों की सूची,हाथ में लेकर घूम रहे थे
काया,माया की छाया में पागल होकर झूम रहे थे
अच्छी-अच्छी नसल के तोते,वक्ताओं को पाल रहे थे
अष्टांग योग की भट्टी में तुम जनमत को उबाल रहे थे
शास्त्र गवाह है कालनिमि की नकली दाडी,मूछ रही हेै
कालाधन और स्वाभिमान अब जनता तुमसे पूछ रही है
मैने तो बस तेरे शब्दो को ही कविता में गाया है
बुझी हुयी इस चिन्गारी को कवि आग ने सुलगाया हेै।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
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