Sunday, October 26, 2014

              नेता की नौकरशाही
अब  तो  सेवक  सर्विसों  के   दायरे  में  आ रहा है
इस  देश  को  धोती नहीं, कुर्ता ,लंगोटा खा रहा है
आज  प्रजातन्त्र  की  आॅंखों  में आॅंशू  दिख  रहे हैं
भेडिये  भटके  हुए ,क्यों भाग्य भारत लिख  रहे हैं

क्यों राजनीति भोग और उद्योग बनती  जा  रही है?
खादीयाॅं , बर्बादियाॅं  क्यों ? बादियों को खा  रही हैं
बे-वजह  कुर्ता , पजामा , बस्तियों  को   छानता है
कोई  माने  या ना  माने  ये  स्वयं   को   मानता है

गणतंत्र की गरिमा गिरी वेतन से नेता से जुड गया
उन  शहीदों की  सहादत  से ,कफन क्यों  उड गया?
इन सेवकों  की  हरकतों से आज भारत मर  रहा है
ये  भिखारी  देश  में , क्यों  राजनीति  कर  रहा  है

कौन  ? उकसाता   है  इनको,  देश  की  सेवा  करो
कौन ? कहता  है कि   चौराहों   पे  चिल्लाकर  मरो
ये  कौन सा षडयन्त्र  है, जो  देश  को  ही  खा  गया
वो  गुलामी  का  जमाना  लौट कर   फिर  आ  गया

इनको  टिकट  भी  राजधानी  के  मसीहा  बाॅंटते हैं
व्यभिचार  के शिरोमणि,व्यभिचार को ही छाॅंटते हैं
छल बल कपट से जीतकर दिल्ली में डेरा डालता है
देख लो  इस  देश   को  ,व्यभिचार  कैसे  पालता है

साठ    वर्षों   में   तो   सेवा    से  पृथक   कानून हैं
हर  पाॅंच  वर्षों  में   नया   ये  कौन ? अफलातून है
निशुल्क है सेवा,धरम् है ,इतिहास,भारत बोलता है
ये  सियासत  का  सिपाही, धन  से  सेवा तोलता है

अब पालिका   पंचायतों   में   ये   बिमारी   आयेगी
राज्य   की   वित्तीय   व्यवस्था   राजनीति  खायेगी
पेन्सनों   से   देश   के   सब   कोष   लुटते   जायेंगे
हर   पाॅंच  सालों  में   नये  रंगरूट  फिर  से  आयेगें

निस्वार्थ  की  सेवा  में  ये सम्पन्न  होते  जा  रहे हैं
बोलती  है  सुर्क   चेहरे   की  चमक , ये   खा  रहे हैं
आज   भारत - वर्ष  को  सूली   पे   नेता   टाॅंगता है
देख  लो  सेवक  सदन   में ,शुल्क   कैसे  माॅंगता हैं

जो छोड  दे  वेतन और भत्ते,सहुलियत सब त्याग दे
पेन्सनों  के  इस  कफन  को, मृत  शवों  सी अाग दे
बस, धर्म  सेवा  का  पुनः  हो   हर  सियासी  भेष में
फिर से दिखेगी  आग  वो, जो  लुप्त थी  इस  देश में।।
           राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग )
                  9897399815
       rajendrakikalam.blogspot.com

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