Thursday, October 23, 2014


                शिशू-धर्म
क्या  भारत  इन बच्चों जैसा  हो  सकता है
क्या सम्प्रदाय, औकात स्वयं की खो सकता हेै
स्कूल, मदरसा, क्या  शैशवता   बो सकता हेै
दाग कफन  पर लगे मजहब भी धो सकता है

सम्प्रदाय का   इन बच्चों  को  ज्ञान नही है
खतना,  टोपी, चोटी  का  अनुमान  नही हेै
पूजा,  नमाज, पाठ,  प्रार्थना  क्या  होती है
अचकन, कुर्ता  और  लंगोटा क्या  धोती है

बच्चों को  तो दुर्गन्ध  प्रदूषित ही  करती है
सम्प्रदाय   से  शैशवता  ही  तो   मरती है
ये कच्ची मिट्टी  है जैसा भी खेल  बनालो
पत्थर, ढेला   मारो  या   खपरैल  बनालो

ये  मन्दिर,मस्जिद, गुरूद्वारे  हमने ही खोले
अल्लाह, ईश्वर, गुरू,गाड सदा हमने ही बोले
बच्चों  को आभाष  नही  कुछ , ज्ञान नही हेै
इन सम्प्रदाय के झगडों का अनुमान नही हेै

हम पढे़ लिखे ,बूढे हैं,फिर भी भान  नही है
अनुभव में  हरकत  तो है, पर जान नही है
सम्प्रदाय  से  राष्ट्र, सदा  घुट  कर  रोता हेै
बस, चलने  का प्रमाण पहुंचना ही होता हेै

इस कट्टर पन ने,कंहा  हमें लाकर छोडा है
हर बच्चे का पथ,मग,और रग-रग मोडा हेै
ये मन्दिर, मस्जिद,गुरूद्वारे,संग्राम अखाडे़
इन बच्चों ने कम, बूढों ने  ये  चमन उजाडे़

राम,कृष्ण, अल्लाह,  ईसा का बचपन देखा
कंहा  खिंची  हैे  सम्प्रदाय,मजहब  की रेखा
टोपी, माला,  कण्ठी, क्रास,  इन्हे  दे  डाला
ये बीज  द्वन्द का  बचपन से हमने ही पाला

हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, इसाई  सारे  आओ
इस लव जेहाद को  छोडो, भैया-दूज मनाओ
क्रिसमस, होली, ईद, मुर्हरम सभी समान है
ये  भारत  तो , हर  मजहब  का  बागवान है

बस,शैशवता का क्रन्दन हो,सब झगडे़ छोडो
इस मानवता के भाव हृदय  में सभी निचोडो
क्यों मजहब, अब इस विकार से ही पकता है
शैशवता  का  राग ‘आग’ ही  लिख सकता है!!
           राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                मो09897399815
      rajendrakikalam.blogspot.com

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