Sunday, October 19, 2014

                         सन्यास
सन्यस्त का लक्षण यही है तन भरा हो मन भरा हो
ज्ञान हो  या  भक्ति हो उद्यान हृदय का हरा हो
साकार हो निर्गुण हो चाहे भाव, अन्दर का खरा हो
प्रफुल्लता से वाषनाऐं,हों तिराहित मन मरा हो

प्रारब्ध का दारिद्रता से स्मरण होता नही है
जागृत,हुआ दिखता तो है पर ध्यान में खोता नहीं है
तुच्छ वैभव का भ्रम भी भाव में,रोता नहीं है
भटकी हुयी हो आत्मा तो मन,कभी सोता नहीं है

आकांछा आडम्बरों की क्षण भ्रमित होती तो है
श्रृंगार की दुनिया,क्षणिक पल्लवित होती तो है
विभत्सता कब तक छिपेगी,दृष्टिगत् होती तो है
आत्मा, उपराम होकर भी द्रवित रोती तो है

प्रारब्ध के इस मार्ग को अवरूद्य करना छोड़ दो
आड़ लेकर धर्म की वैभव में मरना छोड़ दो
चौराहे में भगवान का, व्यवसाय करना छोड़ दो
आध्यात्म के इस भेष में सजना संवरना छोड़ दो

ब्रहमाण्ड की पूरी व्यवस्था शास्त्र ही तो बोलता है
श्रृष्टि का नयता नियन्ता शास्त्र ही तो खोलता है
मोक्ष की परिधि विनायक शास्त्र ही तो डोलता
शास्त्र से साक्षात् हो हर जीव कर कल्लोलता

सम्प्रदायों का भजन कब तक धरा में गाओगे
रक्त-रंजित है धरा कब तक धरा को खाओगे
प्रारब्ध के इस मार्ग में प्रारब्धता, कब लाओगे
ब्रह्म के उदघोष से क्या ब्रह्म को पा जाओगे।।
     राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
        मो0 9897399815
  rajendrakikalam.blogspot.com

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