Tuesday, October 28, 2014

साथियों आज तक हिन्दुस्तान में कोई भी साधू,सन्त या कवि,लेखक इस पीडा को लिखने की हिम्मत ना कर पाया हो,मैं खिन्न होकर भविष्य में घटित होने वाले खतरे की तरफ इसारा कर रहा हूं,आज से से पचास वर्ष पहले के और अब के संस्कारों में परिवर्तन तो आपको स्पष्ट दिखायी दे रहा होगा,पूर्व के साधू,सन्त,विरक्ति और आज वालों में क्या परिवर्तन है यह भी स्पष्ट दिखलायी दे रहा होगा,इसका एक ही कारण है कि हम पूर्ण रूप से पाश्चात्य होते जा रहे हैं,
अगर यह व्यवस्था मात्र धन कमाने तक ही सीमित होती तो शुभ थी, परन्तु धन,वैभव के लिये संस्कार और संस्कृति को गिरवी रखना उचित प्रतीत नही हो रहा है,
और ज्यादा दुख इस बात का है कि जिनको हम धर्म रक्षक मानते हैं, इस महत्वपूर्ण कार्य में वे ही लगे हुये हैं।
भारत विश्व गुरू तभी तक है जब तक हमारे पास आध्यात्मिक धरोहर है, यदि यह लुट गयी तो हम सांसारिक भिखारी तो हैं ही, आध्यात्मिक भिखारी होने में भी देर नही लगेगी,मैं इस खतरे को महसूस कर रहा हूं,आप भी रचना पर चिन्तन,मन्थन करके ही टिप्पणी दें।
धर्म बिक रहा है
आज हमारा धर्म विदेशी धरती का एक हाट हो गया
जैसे लावारिस गंगा मे, मन मर्जी का घाट हो गया
सभी विरक्ती इस धन्धे में तन मन धन से लगे हुये है
हम जैसे कुछ थोडे मुर्दे,इस भारत में जगे हुये है
गोपनीय आध्यात्म जगत को हम कौडी में बेच रहे हैं
माया मिथ्या कहने वाले,केवल माया खैंच रहे हैें
अतरंग चेतना की ये विद्या,तन से मन में डाल रहे हैं
दो कौडी के मायाधारी को धर्मो से पाल रहे हैं
गायित्री मंत्रो की कैसी चोैेराहो पर हाट लगी है
आज धरोहर धर्म-कर्म की क्यों मुर्खो की बाट लगी है
कू-पात्र भी वेद,शास्त्र और धर्मग्रन्थ को खोल रहे हैं
ऋषि मुनि की वाणी देखो सारे तोते बोल रहे हैं
आश्रम,मठ,मन्दिर में केवल,परी विदेशी नाच रही है
बृन्दावन की रास,नाश कर,गोरी चमडी बाँच रही हेै
सुर-तालो की इस माया में,बाबा जी संस्कार भूल गये
काम-वाशना की शूली में,सभी लंगोटेदार झूल गये
जो विदेश में गया यंहा से,वो ही इज्जत दार हो गया
दो पैसे क्या पडे हाथ में,कुल-द्रोही अवतार हो गया
आज विदेशी धरती जाने वालों की क्यों होड लगी हेै
देख रहा हूँ,जटिल व्याधि है,संस्कारो में कोढ लगी हेै
आज सनातन ठेकेदारो के हाथों से लुटा पडा हेै
भारत की ये मूल धरोहर योग,भोग से घुटा पडा है
तन्त्र-मंत्र की सारी विद्या,अखवारो में छप जाती हेै
पातंजलि की योगी पीढी,भीख मांग कर क्यों खाती है
आओ मिलकर धर्म बेचने वालों का बहिष्कार करो
ये इज्जत के योग्य नही है,मिल कर सब तृष्कार करो
आध्यात्म की गुप्त धरोहर का फिर से सम्मान करो
माया में जो गुरू फँसे है,उनका ना गुणगान करो
आध्यात्म जगत का छत विक्षत,विध्वंश दिखायी देता हेै
नासूर धर्म में छिपा हुआ,वो अंश दिखायी देता हेै
मैं सचेत करता हूँ केवल छन्दो की परिभांषा से
कवि आग हूँ,बोल रहा हूूूू,बुझा हुआ कुछ आशा से ।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815

No comments:

Post a Comment