शिव के शव
आदि शंकराचार्य की उदघोषणा में धर्म था
त्रिकाल की संध्या सनातन कर्म का भी मर्म था
विकसित हुये थे चार मठ, वेद के प्रचार में
साधना थी , चार षिश्यों की जगत उद्वार में
आदि शंकराचार्य की उदघोषणा में धर्म था
त्रिकाल की संध्या सनातन कर्म का भी मर्म था
विकसित हुये थे चार मठ, वेद के प्रचार में
साधना थी , चार षिश्यों की जगत उद्वार में
हो सुरक्षित धर्म भी और विश्व का कल्याण हो
धर्म की ही साधना से जीव का परित्राण हो
कर में शोभित दण्ड था अरू वेद थे सज्ञान में
साधना थी धर्म की हर वर्ण के सम्मान में
धर्म की ही साधना से जीव का परित्राण हो
कर में शोभित दण्ड था अरू वेद थे सज्ञान में
साधना थी धर्म की हर वर्ण के सम्मान में
विरूद्व था जो भी सनातन छिन्न करते ज्ञान से
कल्पना थी जीव की भी मोक्ष हो सम्मान से
चतुष्पीठाधीश्वरों में धर्म ही उदघोष था
भिक्षा अनिश्चित शब्द है आत्म का संतोष था
कल्पना थी जीव की भी मोक्ष हो सम्मान से
चतुष्पीठाधीश्वरों में धर्म ही उदघोष था
भिक्षा अनिश्चित शब्द है आत्म का संतोष था
शत् चार से भी बढ़ रहे हैं नित नये जग के गुरू
धर्म में,और ज्ञान में,भी द्वन्द क्यों होता शुरू
धर्म,की रक्षा में केवल ‘शास्त्र’ ही तो शस्त्र है
आडम्बरों के भेष में ‘काषाय’कलुसित वस्त्र है
धर्म में,और ज्ञान में,भी द्वन्द क्यों होता शुरू
धर्म,की रक्षा में केवल ‘शास्त्र’ ही तो शस्त्र है
आडम्बरों के भेष में ‘काषाय’कलुसित वस्त्र है
आघात करते हैं धरम् पर सम्प्रदायों के धडे़
जड मजहब के जंग निज को कहरहे छोटे बडे़
धर्म के अवलम्ब पीठाधीश भी क्यों मौन हैं
शास्तार्थ होना चाहिये कि सम्प्रदायी,कौन है
जड मजहब के जंग निज को कहरहे छोटे बडे़
धर्म के अवलम्ब पीठाधीश भी क्यों मौन हैं
शास्तार्थ होना चाहिये कि सम्प्रदायी,कौन है
उद्वेश्य था चौमास का उर्जा बचाने के लिये
क्यों बनाते हो धरम्, धन्धा चलाने के लिये
लक्ष्य होना चाहिये बस धर्म का व्याख्यान हो
नास्तिकों में,धर्म का भी ज्ञान हो, सम्मान हो
क्यों बनाते हो धरम्, धन्धा चलाने के लिये
लक्ष्य होना चाहिये बस धर्म का व्याख्यान हो
नास्तिकों में,धर्म का भी ज्ञान हो, सम्मान हो
मन प्रफुल्लित सम्प्रदायों से क्षणिक होता तो है
पथ पथिक विचलित हुआ अन्ततः रोता तो है
तीव्रता मजहब व्यवस्था भ्रान्तियोंसे चल रही है
शास्त्र वक्ता मौन हैं आडम्बरों से पल रही है
पथ पथिक विचलित हुआ अन्ततः रोता तो है
तीव्रता मजहब व्यवस्था भ्रान्तियोंसे चल रही है
शास्त्र वक्ता मौन हैं आडम्बरों से पल रही है
सन्यास के सारे अखाडों में पनपती वैरता
संस्कार के बिन,भेष भी सूखी नदी में तैरता
मनमुखी मजहब धरा में कंठ की ध्वनी गायेगा
नास्तिकों की भीड़ से दर्पण धुमिल हो जायेगा
संस्कार के बिन,भेष भी सूखी नदी में तैरता
मनमुखी मजहब धरा में कंठ की ध्वनी गायेगा
नास्तिकों की भीड़ से दर्पण धुमिल हो जायेगा
धर्म में मण्डलेश्वरों का आना जाना छोड़ दो
आचार्यों- मठाधीश्वरों का ताना बाना छोड़ दो
पद के मद की हर व्यवस्था धर्म के,प्रतिकूल है
दिव्यता ‘ब्रहमाण्ड’ की सन्यस्तता का मूल है
आचार्यों- मठाधीश्वरों का ताना बाना छोड़ दो
पद के मद की हर व्यवस्था धर्म के,प्रतिकूल है
दिव्यता ‘ब्रहमाण्ड’ की सन्यस्तता का मूल है
जलनिधि वर्षात में विचलित कभी होता नही
आडम्बरों से धर्म भी स्वाधीनता खोता नही
धर्म तो संस्कार है कण कण में है हर जीव में
ब्रहमाण्ड की सारी व्यवस्था,है सनातन नींव में
आडम्बरों से धर्म भी स्वाधीनता खोता नही
धर्म तो संस्कार है कण कण में है हर जीव में
ब्रहमाण्ड की सारी व्यवस्था,है सनातन नींव में
काट कर भ्रम बादलो को फिर सनातन आयेगा
प्राणियों में वेद का उद्भव, पुनः हो जायेगा
मनमुखी मजहब तिरोहित,क्षय,स्वयं हो जायेगें
शास्त्र में मनु की व्यवस्था,जीव फिर से गायेगें
प्राणियों में वेद का उद्भव, पुनः हो जायेगा
मनमुखी मजहब तिरोहित,क्षय,स्वयं हो जायेगें
शास्त्र में मनु की व्यवस्था,जीव फिर से गायेगें
धर्म में मण्डलेश्वरों का आना जाना छोड़ दो
आचार्यों- मठाधीश्वरों का ताना बाना तोड़ दो
पद के मद की हर व्यवस्था धर्म के,प्रतिकूल है
दिव्यता ‘ब्रह्माण्ड’ की सन्यस्तता का मूल है
आचार्यों- मठाधीश्वरों का ताना बाना तोड़ दो
पद के मद की हर व्यवस्था धर्म के,प्रतिकूल है
दिव्यता ‘ब्रह्माण्ड’ की सन्यस्तता का मूल है
जगत्गुरू पद लक्ष्य है जग ,धर्म से आगे चले
शास्त्र ’सम्मत संप्रदायी, भी जगत में हैं भले
मनमुखी मजहब जगत् से दूर होना चाहिये
छोड़ दो माया के मनके बस सनातन गाइये।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com
शास्त्र ’सम्मत संप्रदायी, भी जगत में हैं भले
मनमुखी मजहब जगत् से दूर होना चाहिये
छोड़ दो माया के मनके बस सनातन गाइये।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
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