Tuesday, October 28, 2014

    नौकर की हैशियत्
हे शंसद के संसय नायक,मुझे बतादो क्या चाहते हो
व्यभिचार के नटखट नायक,कैसे लोकसभा आते हो
छल,बल,कपटी,बाणीभूषण को जनता क्यों मान रही है
शकुनि की ये, नशल देश में कैसे सीना  तान रही है
चौराहे में भारत  माता की इज्जत  क्यों लुटवाते हो
हे शंशद के संसय  नायक ,मुझे बतादो क्या चाहते हो

हिन्दू,मुष्लिम,सिक्ख,ईसाई के तुम ही तो परिणेता हो
प्रजातंत्र के  इस नाटक के कुशल क्षेम के अभिनेता हो
बस्ती-बस्ती, गाॅंव- गाॅंव, नगर-डगर तुमने  बाॅंटा है
देश में  तेरे  साडू  भाई , अंबानी, बिडला, टाटा हैं
जनता की तुम गाली खाकर भी बे-शर्म बने  जाते हो
हे  शंशद के संसय नायक मुझे  बतादो क्या चाहते हो

जांतपांत में कमल,हाथ में रिक्सा,साइकिलऔर हाथी है
डबरों  की ये राजनीति भी,मूरख मजहब  को भाती है
धन- दौलत,दारू ,अय्यासी, तेरी सीढी  बन  जाती है
पाॅंच साल  की  राजनीति  में पीढी  दर पीढी खाती है
मेकप  करके पुरा-तत्व  की कथा मॅंच पर दोहराते हो
हे  शंशद  के संसय नायक मुझे बतादो क्या चाहते हो

साठ साल के बूढों को तो,बानप्रस्त प्रस्थान  लिखा है
बानप्रस्त में इन बूढों को,दिल्ली का फरमान दिखा है
यौनशक्ति की इस औषध को जीवन में कितना खाओगे
हे भारत के भूत भविष्यत कफन औढ कर कब जाओगे
सतरंज, चौपड  के माहिर ऊॅंट,अश्व, पैदल प्यादे  हो
हे शंशद के संसय नायक मुझे बतादो क्या चाहते हो

विश्व-बेंक का सारा कर्जा तुम सब मिलकर चाट रहे हो
राजनीति मतभेद भुला  कर ,माया  बन्दर बाॅंट रहे हो
ऋण सारा तुम ही खाते हो ,ब्याज हमी पर पेल रहे हो
हम ही खेल के र्निणायक हैं,खेल हमी से खेल  रहे हो
गली,मुहल्ले के खलनायक ,आज देश के सहजादे हो
हे शंशद के ससय नायक मुझे बतादो  क्या  चाहते हो

वेतन ,भत्ता पाने को तो ,सभी विरोधी एक  साथ  हैं
ये खादी का धोती, कुर्ता पायजामा सब एक जात है
संस्कारों को भोग- विलाषोें से मिलकर कितना तोडोगे
हे भारत के  भले भिखारी, भीख माॅंगना कब छोडोगे
खादी में भी छिपी व्याधियों को जनता में फैलाते  हो
हे शंशद के संसय नायक मुझे बतादो  क्या चाहते  हो

कंही कोलगेट,कंही घासलेट,कंही गैस,घरों में भारी है
नेता जी के कारण  ही तो  भारत  आज  भीखारी है
कंही आरक्षण,कंही संरक्षण, ये राजनीति फैलाती हेै
प्रजातन्त्र में  ये महामारी  जन-मत से ही आती है
हे शल्य चिकित्सा के माहिर,तुम उपचारों में लगजाते हो
हे  शंशद के संसय नायक मुझे बतादो  क्या चाहते हो

कही सपा.बासपा.बी.जे.पी.कंही कम्युनिष्ट की हाट लगी
इस प्रजातन्त्र में डाकू की टोली  भी  अपने  बाट लगी 
ये सारे  मुद्दे   ढूॅंढ  रहे  हैं मुर्दो  को  भटकाने को
हम  जैसे मुर्दे तरस रहे, दो-वक्त  की  रोटी  खाने को
क्यों जनता  की  लाशों के उपर से कफन चुराते हो
हे शंशद के  संसय नायक मुझे बतादो  क्या चाहते हो

जग में था सम्मान हमारा जो अब तुम से अपमानित है
जयचन्दों की राजनीति ही आज  राष्ट्र  में सम्मानित है
हम  भी  तो मुर्दें  हैं भारत में मुर्दाें को पाल रहे  हैं
दुर्भाग्य  हम  कवियों का है ,हमको ये संभाल रहे  है
कवि आग कीे कविता सुनकर झूठ मूठ तुम हॅंस जाते हो
हे  शंशद के संसय नायक मुझे बतादो  क्या  चाहते हो।।
        राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
           मो09897399815

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