Friday, October 24, 2014

                आतंक के श्रोत
पराधीनता    फैलाता  हूॅं, राजनीति  की  जेहाद हूॅं
इस दुनिया में पनप रहा हूॅं मैं ही तो आतंकवाद हॅूं
मैं  मारूगाॅं  मैं काटूगाॅं  घर-घर  टुकडों में बांटूगाॅं
मावोवादी, नक्शलवादी  पूरी  दुनिया से  छांटूगा
चोर, लूटेरा ,भ्रश्टाचारी ,व्यभिचारी  हूॅं  आबाद हूॅं
इस दुनिया में पनप रहा हूॅं मैं ही तो आतंकवाद हॅूं

हिन्दू,मुश्लिम,सिक्ख,ईसाइ मैं ही तो पैदा करता हूॅं
वैमनस्यता फैलाता  हॅूं ,दुनिया का करता,धरता हूॅं
संस्कारों के घने अरण्य की,पढी मूल में मैं बिष्टा हूॅं
पाप ,पूण्य की परिभांषा हॅूं अहंकार की मैं निष्ठा हूॅं
मैं आलोचक भी  रोचक हूॅं समरसता का संवाद हॅूं
इस दुनिया में पनप रहा हूॅं मैं ही तो आतंकवाद हॅूं

संविधान  का  परिणेता  हूॅं,भ्रष्टाचारी अभिनेता हूॅं
अय्यासी में जीने  वाले  नर, नारी का  मैं क्रेता हूॅं
सर्प विषैले  पाल रहा  हूॅं,अपने ढंग में ढाल रहा हूॅं
घनश्याम की गीता में भी अन्याय खंगाल रहा हॅूं
भटकी कौमें के मुॅंह पर मैं लगा हुआ  वो स्वाद हॅूं
इस दुनिया में पनप रहा हूॅं मैं ही तो आतंकवाद हॅूं

दहशत,व्यभिचार का रस्ता,मैं हूॅं साधन सबसे सस्ता
मंदिर,मस्जिद,गुरूद्वारा भी मान रहा है मुझे फरिस्ता
धर्मो का मैं शास्त्र नियंता आदि अंत का मैंअभियन्ता
मानवता के मन मन्दिर में,राग-द्वेष का मैं भगवन्ता
युगों-युगों  से  इस  श्रृष्टि में  दबा हुआ मैं अवसाद  हॅूं
इस  दुनिया  में पनप रहा हूॅं  मैं ही  तो आतंकवाद हॅूं

मैं  माया हूॅं, मैं  काया  हूॅं ,उस  परमेश्वर की छाया हूॅं
सत्य,सनातन के विरोध में हर विरोध को मैं लाया हूॅं
मैं  श्रृष्टि  के  आदि  अन्त  से  आवारा  हॅूं  घूम रहा हूॅं
भव सागर  के  तल  में बैठा, देख  रहा हॅूं सूॅंघ रहा  हॅूं
सत्ता  और  सियासत के  इस सर्कस में भी आजाद हूॅं
इस  दुनिया  में पनप रहा  हूॅं मैं ही  तो आतंकवाद हॅूं

चमक-दमक में जीने वालों का मैं ही पोषण करता हॅू
अल्पमृत्यु आकालमृत्यु से जीवन का शोषण करता हॅूं
सम्प्रदाय  के  विष मन्थन से द्वन्द गन्द मैं फैलाता हॅूं
अभिलाषाओं की दुनिया में दहशत् से दिल दहलाता हॅूं
हर   फतवे  से   फैल  रहा  हॅूं कलि,फूल  में फौलाद हॅूं
इस  दुनिया  में पनप रहा  हूॅं  मैं ही  तो आतंकवाद हॅूं

कुत्सित अभिलाषा के कारण व्यभिचारी मानव होता हॅूं
आस निरास की दुविधाओं का जीवन आजीवन ढोता हॅूं
अन्तस्थल की लगी आग से उठा  घुआॅं मैं बन जाता हूॅं
छल,बल,कपटी जीवन  ढोने  वालों  को  मैं  ही भाता हॅूं
पावन मन-मन्दिर की सरिता में बहती मैं छिपी गाद हॅूं
इस  दुनिया   में  पनप  रहा  हूॅं मैं  ही  तो आतंकवाद हॅूं

काम, क्रोध,मद, लोभ, मोह  की  अंर्तदृष्टि की  छाया हॅूं
उसी  ब्रह्म  से प्रतिबिम्बित हॅूं, उसी ब्रह्म की  मैं माया हॅूं
भरे  हुये  हर  भोग  विलाषों  से  मैं  आतंकित  होता हॅूं
भय  के भावों के इस  भ्रम  से दहसत् गर्दी  को ढोता हूॅं
अन्र्त बर्हि  चेतनाओं  की असमंजस  की  मैं  फसाद हॅूं
इस  दुनिया  में  पनप रहा   हूॅं मैं ही  तो  आतंकवाद हॅूं

स्वाभिमान की  ध्वजा बना  हूं सबके उपर घूम रहा हॅूं
मेरे   नीचे   मार  काट  हेै , मैं  व्योम  को  चूम रहा हॅूं
राष्ट्र,धर्म और अहंकार को पोषित कर मैं पाल रहा हूॅं
राजनीति की  भ्रष्ट-व्यवस्था शदियों से संभाल रहा हॅूं
धर्मगुरू  की  राजनीति  में  सहस्रार से  उठी  नाद हूॅं
इस  दुनिया  में पनप रहा  हूॅं मैं  ही तो आतंकवाद हॅूं

मैं स्वयं अन्त हॅूं महासन्त हॅूं परिवर्तन में छिपी कला हॅूं
सत्,रज,तम के उपयोगों में आदि,अन्त से सदा चला हूॅं
निर्विकार हॅूं, निर्विचार  हॅूं, चंचल  मन से  चहक  रहा हूॅं
पंच - विकारों  से  बहता  हॅूं, दावानल  से   दहक  रहा हॅूं
संस्कारों की समर भूमि  में,संभल गया तो परं स्वाद हॅूं
इस    दुनिया में  पनप रहा  हूॅं  मैं ही  तो  आतंकवाद हॅूं
                राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग )
                           9897399815
           rajendrakikalam.blogspot.com

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