Saturday, October 25, 2014

ना समझी का उत्तराखण्ड
मै तो एक परिन्दा हूॅं कविता में व्यंग दरिन्दा हॅूं
एक छोटे पद का बाबू हॅूं जो पहले से बे- काबू हूॅं
जनमानस में भाव जगा था नया राज्य बनवायेंगें
सुख सुविधा से इस प्रदेश का भारत भाल सजायेंगें

राजनीति की दुर्वाशना खण्ड-खण्ड से खुश होती है
हल्केपन की राजनीति से नई पीढियाॅं ही रोती हैं
केन्द्र समर्पित हो जाते तो जीवन स्वालम्बी होता
उत्तराखण्ड का जनमानस क्यों भ्रष्टाचारों को ढोता

पलता था जीवन घ्याडी में अब घूम रहैं हैं गाडी में
मुर्ग मसल्लम चलता है जीते थे धबडी बाडी में
घर में नही झंगोरा था अब बासमती की बातें हैं
परेशान थे भाडे़ से अब बत्ती लाल घुमाते हैं

तृष्कार का जीवन था अब संग में डी.एम डोल रहा है
राजनीति की कृपा से बस भ्रष्ट जोर से बोल रहा है
मुश्किल था लखनउ में जाना अब तो देहरादून ठिकाना
देख के नेता गली- गली में भैरव गण ने भी पहचाना

घूम रहे थे मारे - मारे नाली मुटठी पाने को
नेता जी अब ढूॅढ रहे है देहरादून ठिकाने को
जनता सब कुछ देख रही है धन्धा चोर चकारी का
नेताओं पर आस लगी है ,कैसा खेल मदारी का

कोई पौडी का कोई टिहरी का ये कैसा खेल जगीरी का
कुमाॅंऊ यहाॅं पर भारी है ,गुरू दोणाचार्य तिवारी हैं
क्या विकास की बोली है बश भरती अपनी झोली है
हर नेता यहाॅं अधूरा है चमचों का रूतबा पूरा है

कोई नेगी है कोई रावत है हर पद के पीछे दावत है
विस्थापित बशवाने हैं पर अपने नही ठिकाने हैं
सभी मुवावजा खातें हैं नाली का बिगाह बनाते हैं
भू- माफिया भारी है बस मालिक यहाॅं भिखारी है

उत्तराखण्ड में इश्क समाया नेता से इन्दर घबराया
उर्वषी,मेनका,रम्भा गायब देखा तो मंत्री संग पाया
अय्यासी का जो फन देखा हुआ इन्द को खुद में घोखा
बोला चलो मेनका दीदी यहाॅं का नेता बडा अनोखा

ये राज नही अब राग बना36व्यंजन का साग बना
जो राजसभा को भातें हैं वो उत्तराखण्ड से जाते हैं
बाण नही बस तरकस है ये देव भूमि अब सरकस है
सबकी नजरों में टुकडा है ये कैसा गजब का जुकडा है

अधिकारी सब पर भारी है बस खेल उन्ही का जारी है
नेता की हस्ती पहचानी करते हैं अपनी मनमानी
नौकर से मालिक डरता है फिर दोनों का घर भरता है
इनकी ही कलमें चलती हैं फाइल से सत्ता पलती है

खर्चा कई लाख करोडों में बस माल नदारद रोडों में
फाइल में सडक बनाते हैं ये खुल्लम खुल्ला खातें हैं
जो भी सत्ता में आता है अपना ही खेल दिखाता है
पाॅंच साल का करा धरा उसमें भी जाॅंच बिठाता है

विद्यालय बन जाते हैं बच्चे भी फर्जी आते हैं
जो अन्न मिला सरकारों से मिल बाॅंट सभी खा जाते हैं
वेतन भी अच्छा पाते हैं शिक्षक सरकार हिलातें हैं
गुरूजी तो घर में रहतें हैं ये शिशू निकेतन कहते हैं

शिक्षक हडताले करता हैे समाज इन्ही से डरता है
बस माॅंगे पूरी होती हैं बच्चों की किस्मत रोती हैं
गुरूजी के बच्चे अंग्रेजी स्कूल में शिक्षा पाते हैं
उत्तराखण्ड के नवअंकुर बस पहाडों में सड़जाते हैं

नदियाॅ तो हिम से झरती हैं जनता प्यासी क्यों मरती है
पाताल से पानी लाना है पहाडों में पम्प लगाना है
पानी से बिजली गायब है ये कैसी बात अजायब है
बे - सिर पैर की बातें हैं ये नेता की औखातें हैं

शिखरों में रेल बिछायेगें ये कैसा खेल खिलायेगें
बस गैरसैण की बाते हैं कुछ इसी बात की खाते हैं
घर-घर मे खाने के लाले दो चार बने बस मतवाले
भाषण में कैसी भांषा है ये उत्तराखण्ड तमाशा हैं

गुल चमन है इनकी बातों में रिस्ता है कितनी जातों में
कहीं नदी वार कहीं नदी पार ये कैसा युद्व अनाथों में
यहाॅं पुरूष घूमते बाडों में नारी है नरक पहाडों में
शिखरों में सूरज अस्त हुआ गढवाल में भैजी मस्त हुआ

नीचे से दारू ढोते हैं उत्पात यहाॅं पर होते हैं
खडा कौन है पाओं पर घर बार लगा है दाॅंव पर
आज हिमालय लुटता है घर-घर मे रिस्ता टुटता है
देव भूमि की लीला है यहाॅं लाल खून भी पीला है

राज्य लूटकर चन्दा भी दिल्ली के दल में जाता है
उत्तराखंड को राजनीति का मरा भूत भी खाता है
क्यों होते हैं रोज फैसले राजनीति गलियारों से
मुख्यमंत्री बदल रहे है दिल्ली के दरबारों से

भीख माॅंगकर उत्तराखण्ड को स्वीटजरलैंड बनायेंगे
स्विस बैंक के सारे खाते उत्तरारखण्ड में आयेंगें
सपने देखो अपने देखो राजनीति ये गाती है
अब तो टुच्चेपन के भाषण से जनता शर्माती है

सबसे ज्यादा उत्तराखण्ड में रामदेव की धरती है
योग - पीठ गलियारे में सरकारें पानी भरती हैं
सारे आसन राजनीति के टी0 वी0 में दिख जाते है
सत्ता और सियासत की ये कपाल भारती गाते है

पातंजलि के योग सूत्र से स्वाभिमान को गाता है
एक लंगोटा दस साल में दुनिया में छा जाता है
छिपी हुयी है बीस अरब की माया एक लगोटी में
राम देव जी भारत को देखो गरीब़ की रोटी में

आज दिवाकर,त्रिवेन्दर पीछे से छिपकर झाॅंक रहे है
मुख्यमंत्री सभी विधायक,यू0के0डी के भाॅंप रहे है
सत्ता और सियासत भी तो हड्डी मुॅंह में डाल रही है
यू0के0डी के नेताओं की ,क्षमता को खंगाल रही है

मचा हुआ है द्वन्द यहाॅ पर देशी और पहाडी का
तकनीकी के नये दोैर मे देखो खेल कुल्हाडी का
काट रहे है उत्तराखण्ड को जग लगे हथियारों से
आग धधकती देख रहा हूॅ शिखरो में सरकारों से

गाॅव बसाने से पहले , भिखमंगें क्यो चिल्लाते है
क्षेत्र,जाति की आग लगाने सत्ता मे क्यो आते है
क्यो मिलती है पनाह यहाॅ पर दरियादिली दलालो को
उत्तराखण्ड क्यो पाल रहा हैे आवारा फिक्वालो को

शमशान शवो के मुर्दो के आतक शब्द से झेल रहा हूॅ
मै भी तो मुर्दा हूॅ,कविता मे शब्दो से खेल रहा हॅॅू
फिर भी हिम्मत करता हूॅ मुर्दो मे अलख जगाने की
उत्तराखण्ड मे क्यो होती है ,बाते पागलखाने की

प्रमाण पतित पा जाता है शिखरो के भ्रश्टाचारो से
व्यभिचार पनपते जाते है क्यो चुनी हुयी सरकारो से
क्यो बोते हेै बीज घृणा के प्रजातन्त्र की खेती मे
उत्तराखण्ड की देख सियासत् चोरी और डकैती मे

पागल जनता से ही तो ये पागल चुनकर आते है
हम भी पागल प्रतिभाओ से उत्तराखण्ड बनाते है
फिर होती है शूरू लडायी बत्ती पाने वालो की
न!गे - भूखे उत्तराखण्ड मे भरती है घोटालो की

कर्मो का फल भोग रहे है! उत्तराखण्ड बनाने से
अस्तित्व दाॅव पर लगा हुआ है निशाचरो के आने से
देव भूमि की जनता से विनती है इन्हे भगाने की
पागल की औखात यहाॅ है आन्ने और दो आन्ने की

जन-मत का प्रमाण यहाॅ परिणाम दिखाने वाला है
क्षेत्र जाति का पतनाला क्यो गगाजल मे डाला हेै
दूर करो प्रदूषण को जो उत्तरा - खण्ड बचाना है
देव-भूमि की धरती मे क्यो टूच्चो का याराना है

यहा आपदा आती है तो खूब सपदा लाती है
नौकर शाहो नेताओ मे आपस मे बट जाती है
अमछे,गमछे,चमचे भी,खुर्चन मिल बाट के खाते है
जो बाढ़आपदा झेल रहे है ,भूखे ही मर जाते है

उत्तराखण्ड बन जाने से अस्तित्व यहाॅ का खोता है
पानी और जवानी का क्यो रोज पलायन होता है
धृश्टराश्ट्र की राजनीति से वस उजडता देख रहा हूॅ
मै तो अपनी कविता में,ये आग शब्द से फेंक रहा हूॅ

दिव्य शक्तियाॅ मौन पडी है जनता के कू-कर्मो से
देव - भूमि बर्बाद हुयी है हम जैसे बे - र्मो से
चिन्तन,मन्थन ऐसा हो,पहचाने चोर - चकारों को
समय आ गया उत्तराखण्ड से,दो धक्का मक्कारों को

नई पीडी में काम नही है राजनीति में आयेगी
फर्जी निर्माण दिखा करके सत्ता से हाथ मिलायेगी
जिला गाॅंव और पंचायत में नये- नये खे खिलायेगी
उत्तराखण्ड में हेरा - फेरी अब यौवन में आयेगी!!
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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