Sunday, October 26, 2014

                    सिंह नाद
सिंह नाद से शिखर,सिहर-सिहर के कह रहे
तुंगनाथ  से  कहर, लहर शिखर  के बह रहे
वादियों  के हर शहर,प्रखर,पहर को सह रहे
पर्वतों  की  पीर, तीर  अधीर हो  ये कह रहे

जल ,अरण्य,व्योम,सोम,रोम-रोम खोलता
हिमनदों से  पर्वतों की  कौम  को है बोलता
धेर्य को  भी आपदा की इस तुला पे तोलता
कौन  है जो  मौन  हेै, हिला-डुला  के डोलता

पर्वतों  को  छोड  कर  क्यों  जवानी जा रही
ये सियासी,सल्तनत  की  बाड खेत खा रही
बांझ है  क्यों  धरा,जरा  संभल  के  सोचिये
इस  तरह  ना देव-भूमि की धरा को नोचिये

चकबन्दियो से खेत हों अलग रख रखाव के
हों  पृथक, उड्यार, छान, डोखरे भी  गांव के
काम ,हाथ  को  मिले, व्यस्त  हों ये पीढीयां
हों हरे सिहर,शिखर  फिर  दिखे  वो सीढीयां

हो  खडे, पडे-पडे  क्यों  ढो  रहे  हो जिन्दगी
देव-भूमि  की  धरा  में,जन्म  ही  है बन्दगी
पर्वतों  के  धर्म, कर्म, मर्म  को  भी  जानिये
कल्पना   गणेश  की , गरीब  आग  मानिये।।
            राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                  9897399815
        rajendrakikalam.blogspot.com

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